रविवार, 10 अक्टूबर 2010

क्यों ?

*
1.
समझ में नहीं आता कि स्त्री हमेशा विवश बनाये रखने की कोशिश क्यों की जाती है ,उसे परमुखापेक्षी देखने में शायद पुरुषोचित अहं की तृप्ति होती हो !
पुरुष का क्षेत्र जितना व्यापक हो उतना अच्छा .स्त्री का जितना सीमित हो सके कर दो .घर में सीमित  रहे .और पति की सेवा के अलावा और कुछ न जाने तो सर्वश्रेष्ठ !
स्त्री को आनन्द के रस से इसलये वंचित कर दिया कि एक बार यह स्वाद लगने के बाद संसार फीका लगने लगता है ।वह संसार में उलझी रहे और पुरुष मुक्ति का स्वाद ले सके इसलिये सारे संयम नियम ,मर्यादायें,उत्तरदायित्व उस पर लाद कर वह निश्चिंत होगया कि चलो दुनिया के सारे काम चलते रहेंगे सब-कुछ मेरा होगा और मैं मुक्त रहूँगा ।उसके के साथ रोना और आँसू क्यों जोड़ दिये गये हैं?सीता को रोते हुये दुःखी दिखाना ,मूवीज़ में ,कहानियों में हमेशा रोती धोती औरतें! ।माँ है ,तो रो रही है. पत्नी है, तो दुख सहन किये जा रही है,बहन है तो त्याग करना उस का कर्तव्य है .रोना और सहना उनकी नियति है क्यों हँसती हुई प्रसन्न महिलायें क्या अच्छी नहीं लगतीं ?
अगर संसार में रोने का ठेका स्त्री से ले लिया जाय और उसे हँसते हुये और प्रसन्न रहने की सुविधा दी जाय तो संसार अधिक सुन्दर अधिक संतुलित और मन-भावन हो जायेगा !
*
2.

*
अम्माँ जी खाना खा चुकी थीं. 
अब दाँत काम नहीं देते .ज़रा सी कड़ी चीज़ भी चबाते नहीं बनती फिर ये तो सुबह की बनी रोटियाँ .थाली में रखी-रखी और सूख गईँ थीं .कोरें अलग कर अम्माँजी ने बाकी रोटी दाल में भिगो कर 
उठीं तो थाली में रखी , सूखी कोरें हाथ में समेट कर चल दीं .

बहू ने तीक्ष्ण दृष्टि से देखा,' जे का अम्माँ जी ,रोटी की सूखी कोरें ,विनीता की अम्माँ को दिखाबे जाय रही हो ?''

झुर्रियों से भरा चेहरा उठा, बहू को देखा बोलीं ,.'नाहीं बहू,हम काहे को दिखाने लै जाएँगी?,ई हमसे चबाई नहीं जातीं सो निकाल कर रख दीं .अब बाहर चिरैयन को डाल देंगी .अन्न काहे फिंके ,किसी परानी के पेट में चला जाए .'

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

हवा में मैटर

*


अब भी वह मैटर कभी-कभी हवाओं के साथ उड़ आता है .

एक बार प्लान बनाया था -पूरा नकशा नहीं बना था, बनने की प्रक्रिया में था .

हुआ यों कि उपन्यास साहित्य पर बहस चल रही थी .अचानक मन में आया एक उपन्यास लिखें मिल कर -एक लेखक एक लेखिका .

विभाजन के चार सूत्र हो सकते हैं -

1 पुरुष पात्रों का काम पुरुष लेखक करे ,नारी पात्रों का लेखिका .

2. पुरुष पात्रों का लेखिका करे और नारी का लेखक

3 एक-एक अध्याय बारी-बारी से- एक जहाँ से छोड़े वहाँ से दूसरा उठाए .

4 एक प्रारंभ करेगा.दूसरा समापन .

भाषा-शैली में अनुरूपता रखी जाए कि पढ़ने वालों को झटके न झेलने पड़ें.एक-दूसरे के अनुकूल बने रहने की लगातार कोशिश करें .

मन में मैटर जमा होने लगा .

पर योजना धरी की धरी रह गई .

मैटर कभी समाप्त होता है क्या -किसी-न किसी रूप में कभी-न-कभी ढल ही जाएगा .
*

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मैं लिख दूँगा !

***


दृष्य- 1

हमने सुना है इस बीरन सिंग ने भाषण लिखने का काम तुम्हें सौंपा है ?

हाँ मुझसे कहा गया है . लिख दूँगा ,जाने कित्ते भाषण लिखे हैं .इन चुनाव लड़नेवालों को कुछ आता-जाता थोड़े है ,औरों के दम पर पलते हैं

लिख तो तुम दोगे ,वाहवाही उनकी करवाओगे .और पता है इस आदमी ने किया क्या है?

क्या किया ?

क्या नहीं किया उसने ये पूछो उसमें .हमारी गाँव की ज़मीन हथिया ली इसने .जाने कितने गुंडों का पाल रखा है ,

अच्छा !
ये  जो नेताजी का भट्टा है ,इसकी असलियत पता है.भट्टा क्या बदमाशों का अड्डा है .दिन में ईँटें पथती हैं औऱ रात में ट्रक लेकर डाका चालने निकलते हैं .
नेता जी के भतीजे की बस है ,लािसेंस की क्या ज़रूरत इन्हें !सालों ऐसी ही चलती है .हम तो कई बार इस पर आए गये हैं ..बैसे भी हमें कभी चिकट नहीं लेना पड़ता .
ससुरे सब बदमाश हैं .हत्या ये करवाएं .डाके ये डलवाएं .
लोगों को उठा लाते हैं और सँदेसा भइजवा देते हैं ,इतने पैसे ,इतना धन यहाँ रख जाना ..
अरे अभी पिछले साल मसहूर डाक्टर को ग़ायब कर लाए .पिस्तौलबाज़ी से कोई घायल हुआ होयगा अपना आदमी .या किसी का पेय गिरवाना होगा .अदावत तो चलती ही रहती है .
जब जरूरत हुई किसी डाक्टर या लेडी डाक्टर को पकड़ लाते हैं .
और तुम मेरे दोस्त ,उसी की वाह-वाही कराओगे ?

तुम चाहते क्या हो ?

पिटे या मुँह काला करके जाए यहाँ से.

पढ़ा-लिखा है ?

आठवीं पास .पैसे और गुंडों के बल पर बना बैठा है .

जाओ, हो जाएगा तुम्हारा काम .

कैसे?

सब समझा दूँगा .

*

दूसरा दृष्य (उम्मीदवार के भाषण का ताम-झाम) .

एक आदमी -,काहे कित्ती देर हैं ,बीरन बाबू अभै आये नहीं ?

दूसरा- चल पड़े हैं हुअन से.बस पाँचै मिन्ट में पहुँचन वारे हैं .

तैयारी तो पूरी है .

हम होयँ और काम में कसर रहि जाय .अइस कइस हुइ सकत है .

अरे ये लाठा-आठी कहे को ,

गाँव के लोग लाठी बिना कइस चलें .मारग में कुत्ता ,पीछे लगि जाय तौन ..

एक -अरे ऊ तो हमार गाम केर मानुस है ,नेताजी का गाँव .निसाखातिर रहो .

लो ,आगए ,आ गए ..

सब चुप होकर बैठ गए .

नेता जी ने अपना भाषण शुरू किया ,'मैं सालों से यही कहता रहा हूँ कि आज जो ...'

आगे की तीसरी पंक्ति से एक आदमी चिल्लाया ,'गाली दे रहा है ,देखो तो जरा !

एक और चिल्लाया -हम भाषण सुनने आये हैं -गाली-गलौज सुनने नहीं !

क्या कहा ?

साला -साला कह रहा है सबन को .

सच्ची? ,

अरे अभी तो कहा ,कहो फिर कह दे .

हमें साला कह रहा है ....दो तीन लोग उठ कर खड़े हो गये -क्या कहा ,क्या कहा ..?

अरे अभी अभी तो कहा.

क्या बात है भई ,पीछे आवाज़ नहीं जा रही क्या ?..

.फिर से कहिये ।कुछलोगों ने नहीं सुना ।

मंत्री जी और ज़ोश से चिल्लाये ,'सालों से कह रहा हूँ ..अब तो सुनाई दे रहा है ?'

उन्होंने फिर से भाषण शुरू किया ,हाँ तो ज़ोर-जोर से बोल रहा हूँ कि सब सुन लें , मैं यही बात सालों से कह रहा हूँ

क्या कह रहे हो मंत्री जी. फिर से तो कहना -

अरे चीख़-चीख कर कह रह हूँ -सालों से कह रहा हूँ हाँ,सालों से .

देखा,बराबर कहे जा रहा है !

हाँ ,बराबर गाली दिए जा रहा है..हम लोग चुप्पै सुनते रहेंगे का इनकी गालियाँ?

क्यों महावीरे ?

महावीरे के साथ दो-चार लोग और उठ खड़े हुए .

एक चिल्लाया-हम गालियाँ सुनने नहीं आए हैं .

बैठों में से किसी ने पूछा-हाँ, सच्ची गाली दे रहा है

और क्या झूठ बोल रहे हैं हम ?लेओ फिर से सुनवाए देते हैं .

स्टेज से मंत्री चिल्लाए .ये क्या गड़बड़ हो रहा है ,आप लोग चुप्पे सुनिए हम बड़े मार्के की बात कहने वाले हैं

सुरू वाला इन लोगन ने सुन नहीं पाया सो मार चिल्लाय रहे हैं ,

सुरू की लाइने फिर से बोल देओ

ओहो ,कित्ती बार कहें कही बात ?,चलो फिर से कहे दे रहे हैं ,अब साफ़ सुन लेना सालों से ....

फिर तो हल्ला मच गया .लोग खड़े होने लगे.

कुछ लोग स्टेज पर चढ़ गए .अफरा-तफ़री मच गई .घेर लिया उन लोगो ने .

नेता चिल्ला रहे हैं .सफ़ाई दे रहै हैं कौनो नहीं सुन रहा ,कुछ तो बड़े उत्तेजित हैं.

वे गिड़गिड़ा रहे हैं- हमार ई मतबल नहीं रहे .

हाथ जोड़े घिघिया रहे हैं .उन्हें बचानेवाले ,पुलिसवाले सब भकुआए इधर-उधऱ भाग रहे हैं .

ई नेता की दुम पबलिक का गाली देता है .

हो रही है मरम्मत मंच से नीचे खींच कर .पुलिस छुड़ाए-बचाए तब तक गत बना डाली लोगन ने .

दोनों दोस्त किनारे खड़े हैं .

क्यों ,अब तो खुश,हो गई मंशा पूरी ?

कमाल कर दिया !

आज तुम्हार अक्कल का लोहा मान गए .

चलो अब काफ़ी हो गया .

फिर दोनों लोग पहुँच गए और लोगों से छुड़ा लाए नेता को, चच्,चच् करते सहानुभूति दिखाते.

अरे ई लोग ठहरे गँवार ,आप कहाँ ढँग की बात कहि रहे हो .चलिए चलिए .सब उजड्ड हैं कौनो बात करने लायक नहीं .

ले गए नेता जी को हल्दी डाल के गरम दूध पिलाने.

**

शनिवार, 4 सितंबर 2010

केवल महिलाओं के लिए

* (कुछ उपयोगी सुझाव)

जिस समय पति से  घर का कोई काम करा रही हों -

* 1 . उस समय आपको खाली नहीं रहना चाहिए कुछ करती हुई ही दिखाई दें.चाहे दूसरे कमरे में चली जाइये वहाँ चाहे जो चाहें करिए .चले जाना इसलिए भी अच्छा है कि काम करने का उनका ढंग देख कर आप बिना टोके रह नहीं पाएँगी (बेकारमें  कहा-सुनी होने लगे तो जो काम कर रहे हैं उससे भी जाएँगी).
* 2 . दिखना  यही चाहिए कि आप व्यस्त हैं .कुछ पढ़ना ही चाहें तो कोई कपड़ा और सुई-धागा सामने कर के, कोई देखे तो लगे कि कुछ सिलाई चल रही हैं.
* 3 .इधर आना हो तो हँसती हुई कदापि न आएं ,खुश न दिखाई दें नहीं तो वे समझेंगे मुझसे काम करा के खुश हो रही है .
* 4 . थोड़ा सा मुँह बना लें तो और अच्छा  .किसी बात पर हँसी भी आए तो दूसरी जगह जाकर हँस आएँ ,इधर आने पर गंभीर होना या मुँह ज़रा चढ़ा होना फ़ायदेमंद है  .इससे उनकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि कहें  'ज़रा यह उठा दो '',वो रख दो' .नहीं तो जब तक कुछ करेंगे आपको बराबर घेरे रहेंगे.
**

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

चलती चक्की

*
'चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय...'
अगर कोई चलती चक्की देख कर रो दे, तो कोई क्या करे !
उसकी बेवकूफ़ी !
 चक्की तो चलेगी ही ,दाने पिसेंगे ,नहीं तो लोग खायेंगे क्या?
ऐसे, जीवन कैसे चलेगा !
ये तो दुनिया की रीत है ,सृष्टि का नियम .तुम दाना बनने के बजाय चक्की के पाट बनो जो काम कर रहा है ।या भोक्ता बनो ,पोषण प्राप्त करो .
देखो कबीर, चक्की चलानेवाले हाथों को कभी देखा? उनके बारे में सोचते जो घूमते हैं भारी पाटों को खींचते हुए
तुम्हारी भूख शान्त करने को . .कभी ख़ुद भी चला कर देखो,कबीर .

वाह रे  !कभी चलती  चक्की देख कर रोते हो ..कभी ,जागते हो और रोते हो
' सुखिया सब संसार है खाए अरु सोवै ,
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै '.
दुनिया में आये हो तो रो-रो कर मत रहो , हिम्मत से काम लो !
यह तो सारी दुनिया चलती हुई चक्की है
 यह तो यहाँ का क्रम है ।पत्ते झड़ेंगे ,दिन डूबेगा ।फिर वसंतऋतु आयेगी ,रात के बाद फिर सुबह होगी ।
तुम तो जानते हो -
'सुर नर मुनि अरु देवता ,सप्त-दीप, नव-खंड,
कह कबीर सब भोगिया देह धरे को दंड.'
देह धरी है ,दंड  भुगतना ही पड़ेगा- रोकर ,चाहे हँस कर !
*!

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

लाचार आदमी !

एक ख़बर-

 'आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने परीक्षा में नकल करने के आरोप में पांच जजों को निलंबित कर दिया है. वारंगल जिला स्थित काकतीय विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में 24 अगस्त को मास्टर ऑफ लॉ [एलएलएम] की परीक्षा के दौरान अजीतसिम्हा राव, विजेंदर रेड्डी, एम. किस्तप्पा, श्रीनिवासआचार्य और हनुमंत राव नाम के जज नकल करते पकड़े गए.

विश्वविद्यालय के अतिरिक्त परीक्षा नियंत्रक एन. मनोहर के अनुसार, ये जज कमरा नंबर 102 में परीक्षा दे रहे थे तभी उनके नेतृत्व में एक दल औचक निरीक्षण पर वहां पहुंच गया. इन जजों में से एक ने कापी के अंदर कानून की किताब छुपा रखी थी और उससे नकल कर रहे थे. अन्य जजों के पास से लिखी हुई पर्चियां और पाठ्य पुस्तकों के फाड़े हुए पन्ने बरामद हुए. निरीक्षकों ने इन सभी चीजों को जब्त कर लिया और जजों को आगे लिखने से रोक दिया.'

क्यों क्या जज इंसान नहीं होते ?

परीक्षा के तो नाम से ही दम खुश्क हो जाता है .और क्योंकि  परीक्षा दे रहे थे, उस स्थिति में वे केवल परीक्षार्थी थे .न जज थे न मुवक्किल ,न वकील.अगर परीक्षा-कक्ष में जज होते तो तो जजमेंट का काम उनका होता ,वे स्वयं किसी के निरीक्षण  के अंतर्गत नहीं होते .
परीक्षा देने की मानसिकता ही अलग होती है .और अचानक निरीक्षण !
बिना वार्निंग के तो गोली भी नहीं चलाई जाती .पहले बता देना था. अब उनका जजमेंट कौन करेगा.साधारण आदमी  जजों का न्याय करे इससे बड़ा अन्याय उन पर क्या होगा ?
तरस आ रहा है मुझे तो उन बेचारों पर .
जब राजनीति के ऊँचे-ऊँचे लोग न्याय से ऊपर होते हैं तो एक जज तो वैसे भी न्याय से ऊपर हुआ.न्याय तो एक प्रक्रिया है ,जिसे करनेवाला वह ख़ुद है.
कोई बंद आँखोंवाला न्याय का तराजू सँभाले है ,
- और बेचारा जज - लाचार आदमी !

 आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने परीक्षा में नकल करने के आरोप में पांच जजों को निलंबित कर दिया है। वारंगल जिला स्थित काकतीय विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में 24 अगस्त को मास्टर ऑफ लॉ [एलएलएम] की परीक्षा के दौरान अजीतसिम्हा राव, विजेंदर रेड्डी, एम. किस्तप्पा, श्रीनिवासआचार्य और हनुमंत राव नाम के जज नकल करते पकड़े गए।
विश्वविद्यालय के अतिरिक्त परीक्षा नियंत्रक एन. मनोहर के अनुसार, ये जज कमरा नंबर 102 में परीक्षा दे रहे थे तभी उनके नेतृत्व में एक दल औचक निरीक्षण पर वहां पहुंच गया। इन जजों में से एक ने कापी के अंदर कानून की किताब छुपा रखी थी और उससे नकल कर रहे थे। अन्य जजों के पास से लिखी हुई पर्चियां और पाठ्य पुस्तकों के फाड़े हुए पन्ने बरामद हुए। निरीक्षकों ने इन सभी चीजों को जब्त कर लिया और जजों को आगे लिखने से रोक दिया.'
क्यों क्या जज इंसान नहीं होते ?
परीक्षा के तो नाम से ही दम खुश्क हो जाता है .और क्योंकि  परीक्षा दे रहे थे, उस स्थिति में वे केवल परीक्षार्थी थे .न जज थे न मुवक्किल ,न वकील .अगर परीक्षा-कक्ष में जज होते तो तो जजमेंट का काम उनका होता ,वे स्वयं किसी के निरीक्षण  के अंतर्गत नहीं होते .
परीक्षा देने की मानसिकता ही अलग होती है .और अचानक निरीक्षण !
बिना वार्निंग के तो गोली भी नहीं चलाई जाती .पहले बता देना था . अब उनका जजमेंट कौन करेगा .साधारण आदमी  जजों का न्याय करे इससे बड़ा अन्याय उन पर क्या होगा .
तरस आ रहा है मुझे तो उन बेचारों पर .
जब राजनीति के ऊँचे-ऊँचे लोग न्याय से ऊपर होते हैं तो एक जज तो वैसे भी न्याय से ऊपर हुआ .न्याय तो एक प्रक्रिया है ,जिसे करनेवाला वह ख़ुद है.
कोई बंद आँखोंवाला पात्र  न्याय का तराजू सँभाले है 
- और बेचारा जज ,लाचार आदमी !

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

चिन्ता तुम कहाँ हो ?

*
. उस दिन एम.ए. फाइनल की कक्षा लेकर डिपार्टमेंट की ओर जा रही थी कि चिन्ता पीछे आती दिखाई दी .क्लास की बड़ी सजग छात्रा है .ऐसी छात्राओं को पढ़ाना अच्छा लगता है . 
साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय राम-काव्य और कृष्ण काव्य परंपराओं  की परवर्ती रचनाओं में बदलती हुई दृष्टियों और सामाजिक संबंधों के तेवर कैसे बदल गये हैं यह स्पष्ट करते  बदलते हुये समाज में नारी के प्रति बदलते हुये मानों का विश्लेषण के साथ  ,सीता और राधा की बात अनायास ही आ जाती है ।वाल्मीकि की तेजस्विनी सीता तुलसी के कव्य में कितिनी निरीह बना दी रई है ,और कृष्ण काव्य में बाल्यवस्था की सखी राधा को परकीया बना कर  कितना महत्व दिया गया  है यही बातें चल रही थीं ।
'मैम मैं कई बार आपके पास आने को हुई पर आप बिज़ी थीं या आपके साथ कोई -न -कोई होता था.मैं आपसे कुछ डिस्कस करना चाहती हूं . '
'हाँ,हाँ ,आओ चलो बैठते हैं .

'देखिये सीता के भक्त कितने हैं और राधा के ..सारी कृष्ण भक्ति राधा से भरी पड़ी है ,कहीं -कहीं तो केवल राधा, कृष्ण भी पीछे रह गये .कैसी है पुरुष-वृत्ति !हमें उपदेश दें सीता का अनुकण करो और खुद राधा के पीछे दौड़  जायँ ?
मुझे हँसी आ गई ,वह भी मुस्करा पड़ी ,
'देखो ,चिन्ता !एक बात भक्ति में राधा -भाव का महत्व है  पर बाद मे  कवियों ने राधा -कृष्ण के बहाने अपनी वासना कथा में रंग भरते गये .' 
हम दोनों खुल कर हँस पड़े  .
मैं उसका मुँह देखती रही .बहुत सचेत छात्रा थी वह ,काफ़ी कुछ पढ़ा था उसने  अध्ययशीला थी .ऐसी छात्रायें बहुत दुर्लभ होती जा रही हैं .उम्र में अन्य कक्षा की अन्य छात्राओं से थोड़ा बड़ी बड़ी ,विवाहिता भी .अक्सर ही काफ़ी उम्रदराज़ लड़कियाँ ,खाली बैठे की बोरियत से छुटकारा पाने को हिन्दी में एडमिशन ले लेती हैं -बैठे-ठाले एम.ए. हो जायें ,क्या बुरा है .
  
कभी-कभी क्लास में कसी बिन्दु पर वह कुछ पूछती और विषयान्तर हो जाता तो कुछ छात्राओं के चेहरे से लगता कि लगता यह  पढ़ाई में बाधा डाल रही है .
'देखिये न वाल्मीकि रामायण की सीता की सारी तेजस्विता और प्रखरता तुलसी के मानस में ग़ायब हो गई ।दीन और आश्रिता बन गई .'
'रचनाकार की अपनी दृष्टि है.'
'बहुत पहले जब हमारे प्रोफ़ेसर सा.ने लड़कियों की ओर देख कर कहा था -'सीता अनुकरणीया है राधा नहीं !'
 हमने कुछ नहीं कहा था, हमारा समय दूसरा था .
और आज मेरी छात्रा  प्रश्न कर रही है .

 छात्राओं से सब-कुछ नहीं कहा जा सकता .एक सीमा में रह कर ही पढाना है .
मैंने  जो कहा वह किसी एक के लिए नहीं, समाज की मान्यताओं के लिये कहा ।मुझे जो मिला था वही उपदेश मैनें  दे दिया .

कभी-कभी  स्वयं से पूछती हूँ  मैं इन्हें कुछ उल्टा-सीधी तो नहीं पढ़ा रही! जो परंपरा से चला आ रहा है उसे आगे बढ़ाना है अगर लीक से हट कर इनका स्वतंत्र व्यक्तित्व बन गया तो बहुत से प्रश्न उठ खड़े होंगे ,जिनका समाधान किसी के पास नहीं .
इतना और ऐसा सोचनेवाली लड़की कितनी सुखी होगी !

बहुत कुछ जानना  चाहती हूँ .
पर चिन्ता ,तुम हो कहाँ ?