*
1.
समझ में नहीं आता कि स्त्री हमेशा विवश बनाये रखने की कोशिश क्यों की जाती है ,उसे परमुखापेक्षी देखने में शायद पुरुषोचित अहं की तृप्ति होती हो !
पुरुष का क्षेत्र जितना व्यापक हो उतना अच्छा .स्त्री का जितना सीमित हो सके कर दो .घर में सीमित रहे .और पति की सेवा के अलावा और कुछ न जाने तो सर्वश्रेष्ठ !
स्त्री को आनन्द के रस से इसलये वंचित कर दिया कि एक बार यह स्वाद लगने के बाद संसार फीका लगने लगता है ।वह संसार में उलझी रहे और पुरुष मुक्ति का स्वाद ले सके इसलिये सारे संयम नियम ,मर्यादायें,उत्तरदायित्व उस पर लाद कर वह निश्चिंत होगया कि चलो दुनिया के सारे काम चलते रहेंगे सब-कुछ मेरा होगा और मैं मुक्त रहूँगा ।उसके के साथ रोना और आँसू क्यों जोड़ दिये गये हैं?सीता को रोते हुये दुःखी दिखाना ,मूवीज़ में ,कहानियों में हमेशा रोती धोती औरतें! ।माँ है ,तो रो रही है. पत्नी है, तो दुख सहन किये जा रही है,बहन है तो त्याग करना उस का कर्तव्य है .रोना और सहना उनकी नियति है क्यों हँसती हुई प्रसन्न महिलायें क्या अच्छी नहीं लगतीं ?
अगर संसार में रोने का ठेका स्त्री से ले लिया जाय और उसे हँसते हुये और प्रसन्न रहने की सुविधा दी जाय तो संसार अधिक सुन्दर अधिक संतुलित और मन-भावन हो जायेगा !
*
2.
*अम्माँ जी खाना खा चुकी थीं.
अब दाँत काम नहीं देते .ज़रा सी कड़ी चीज़ भी चबाते नहीं बनती फिर ये तो सुबह की बनी रोटियाँ .थाली में रखी-रखी और सूख गईँ थीं .कोरें अलग कर अम्माँजी ने बाकी रोटी दाल में भिगो कर
उठीं तो थाली में रखी , सूखी कोरें हाथ में समेट कर चल दीं .
बहू ने तीक्ष्ण दृष्टि से देखा,' जे का अम्माँ जी ,रोटी की सूखी कोरें ,विनीता की अम्माँ को दिखाबे जाय रही हो ?''
झुर्रियों से भरा चेहरा उठा, बहू को देखा बोलीं ,.'नाहीं बहू,हम काहे को दिखाने लै जाएँगी?,ई हमसे चबाई नहीं जातीं सो निकाल कर रख दीं .अब बाहर चिरैयन को डाल देंगी .अन्न काहे फिंके ,किसी परानी के पेट में चला जाए .'
1.
समझ में नहीं आता कि स्त्री हमेशा विवश बनाये रखने की कोशिश क्यों की जाती है ,उसे परमुखापेक्षी देखने में शायद पुरुषोचित अहं की तृप्ति होती हो !
पुरुष का क्षेत्र जितना व्यापक हो उतना अच्छा .स्त्री का जितना सीमित हो सके कर दो .घर में सीमित रहे .और पति की सेवा के अलावा और कुछ न जाने तो सर्वश्रेष्ठ !
स्त्री को आनन्द के रस से इसलये वंचित कर दिया कि एक बार यह स्वाद लगने के बाद संसार फीका लगने लगता है ।वह संसार में उलझी रहे और पुरुष मुक्ति का स्वाद ले सके इसलिये सारे संयम नियम ,मर्यादायें,उत्तरदायित्व उस पर लाद कर वह निश्चिंत होगया कि चलो दुनिया के सारे काम चलते रहेंगे सब-कुछ मेरा होगा और मैं मुक्त रहूँगा ।उसके के साथ रोना और आँसू क्यों जोड़ दिये गये हैं?सीता को रोते हुये दुःखी दिखाना ,मूवीज़ में ,कहानियों में हमेशा रोती धोती औरतें! ।माँ है ,तो रो रही है. पत्नी है, तो दुख सहन किये जा रही है,बहन है तो त्याग करना उस का कर्तव्य है .रोना और सहना उनकी नियति है क्यों हँसती हुई प्रसन्न महिलायें क्या अच्छी नहीं लगतीं ?
अगर संसार में रोने का ठेका स्त्री से ले लिया जाय और उसे हँसते हुये और प्रसन्न रहने की सुविधा दी जाय तो संसार अधिक सुन्दर अधिक संतुलित और मन-भावन हो जायेगा !
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2.
*अम्माँ जी खाना खा चुकी थीं.
अब दाँत काम नहीं देते .ज़रा सी कड़ी चीज़ भी चबाते नहीं बनती फिर ये तो सुबह की बनी रोटियाँ .थाली में रखी-रखी और सूख गईँ थीं .कोरें अलग कर अम्माँजी ने बाकी रोटी दाल में भिगो कर
उठीं तो थाली में रखी , सूखी कोरें हाथ में समेट कर चल दीं .
बहू ने तीक्ष्ण दृष्टि से देखा,' जे का अम्माँ जी ,रोटी की सूखी कोरें ,विनीता की अम्माँ को दिखाबे जाय रही हो ?''
झुर्रियों से भरा चेहरा उठा, बहू को देखा बोलीं ,.'नाहीं बहू,हम काहे को दिखाने लै जाएँगी?,ई हमसे चबाई नहीं जातीं सो निकाल कर रख दीं .अब बाहर चिरैयन को डाल देंगी .अन्न काहे फिंके ,किसी परानी के पेट में चला जाए .'
