बुधवार, 9 जून 2010

सोचिये मत.

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जब पढती थी तब पढ़ाया गया था 'अपारे काव्य संसारे कविरैव प्रजापतिः .
अक्सर यह होता है ,छात्र-जीवन में जो पढ़ाया जाता है ,उसे हम पढ़ लेते हैं ।उसमें कितना सच है उस समय समझ में नहीं आता .पर विज्ञों द्वारा एक बात कही गई है -सोच कर चुप हो जाते हैं ,कि उसके पीछे गहरे अनुभवों की लंबी परंपरा होगी ।सब का मैं नहीं कह सकती क्योंकि कुछ अति तीव्र-बुद्धि लोग उसका सच तुरंत आत्मसात् कर लेते होंगे , पर तब मेरे गले से पूरा नहीं उतर पाता था ।
लेकिन अब मैं अपने चारों ओर वही सब घटता देख कर समझ गई हूँ ।
हाँ तो बात थी ,कवि निरंकुश होता है ।कवि से उनका मतलब रचनाकार से होता था ,अर्थात् लेखक !इधर कहानियों ,उपन्यासों के लेखक ... फिर सिनेमा की कहानियाँ और एक से एक टीवी सीरियल!।जो वहाँ देखा ,जीवन में कहीं होता नज़र नहीं आया ।घर में किसी लड़की को पेड़ की डाल के सहारे विरह के गीत गाते मैं न पा सकी कॉलेज का ऐसा रंगीन वातारण छात्र-छात्राओं का निरंकुश व्यवहार , कहीं डिसिप्लिन नहीं ,गाँवों की वेष-भूषा और जवान लड़कियों का खेतों में नाचना गाना । प्रेम-गीतों के दृष्यीकरण में खूब हरे-भरे पार्क में ,दोनों का प्रेमालाप एक ही दृष्य में , कपड़े बदल-बदल कर एक दूसरे के पीछे दौड़ना ,नाचना ,लिपटना-चिपटना ,और उस समय वहाँ कोई आता नहीं ,जब कि हिन्दुस्तान में ऐसा हो तो लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाय .पर लेखक यदि चाहे तो क्या नहीं कर सकता ?जो कहीं न दिखाई दे वह देख लीजिये हिन्दी के सीरियल्स और मूवीज में. एक से एक चमत्कार चमत्कार !एक से एक नई उद्भावनायें -संभव-असंभव सब ।
सोचिये मत नहीं तो सिर घूम जायेगा ,सिर्फ़ आँखें फाड़ कर देखिये और दाद दीजिये रचनाकार की पहुँच की !
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