बुधवार, 12 मई 2010

शिव क्यों नाचते हैं ?

(सुना-गुना)
शिव क्यों नाचते हैं ?
जिसमें जीवन और मृत्यु का संतुलन बना रहे .
नृत्य रुका सृष्टि समाप्त.वह सिर्फ़ प्रलय-नृत्य नहीं है ,जो तभी होता है जब उन्हें क्रोध आता है .उन्हें अकारण क्रोध नहीं आता ,अक्षम्य होने पर ही आता है .और फिर विनाश का ताँडव-भूकंप,बाढ़.युद्ध.महामारी .
उनके डमरु-नाद से जीव के अंदर आत्मा प्रवेश करती है ,चरणों की थाप से धरती अन्न-मूल-फल उगाती है.वे ही हैं नृत्य-कला के प्रारंभ कर्ता.वैद्य परंपरा के प्रथम आचार्य-महाभिषग.
वे वनों में मात्र साधना नहीं करते नृत्य और गायन के प्रथम आचार्य हैं.नृत्य-शास्त्र का जन्म उन्हीं के पैरों की थाप और होथों की मुद्राओं से हुआ.उनका नृत्य विनाशकारी नहीं सृजन का है.
वे परम योगी हैं-पर घर -गृहस्थी के बीच रह कर,पत्नी-पुत्रों के साथ उन्हें भरपूर प्यार देते हुए .भोग और योग का अद्भुत संगम है.
दिगंबर हैं शिव.सृष्टि को स्थिरता देने वाली शक्ति हैं दिक्-वही उनका वस्त्र है .जीवन-दायिनी गंगा को शिर पर धरते हैं ,फिर भी वे संपूर्ण मानव हैं -काशी ,उज्जयिनी,हरद्वार जैसी नगरियाँ उन्हीं की बसाई हुई है .मस्तमौला हैं .डट कर मद्य-सेवन करते हैं.ज्ञानी इतने कि तंत्र-विद्या के जनक भी वही हैं.(श्यामा तंत्र पहला तंत्र है जो शिव ने रचा.)विष को भी पी जाने वाले .
बैल -कृषि-प्रधान सभ्यता का प्रतीक है ,इसीलिए जीवन के बहुत समीप हैं .हमारे हितैषी हैं.धरती केा सर्वनाश करने पर तुली महाकाली के चरणों में लेट कर उन्हें शान्त कर देते हैं .
वे पशुपतिनाथ हैं.-वनों और वनचरों की हत्या के नितान्त विरुद्ध .
सारे आगम उन्हीं ने रचे हैं इसीलिए वे महेश्वर कहलाए .वे सृष्टि की स्थिति के देव हैं
जगत का आदि कारण ही शिव की इच्छा और क्रिया ही उनका निरंतर नृत्य है ,जिसके लय-ताल-थाप से धरती में जीवन का संचार होता है ..

1 टिप्पणी:

  1. हम्म..पहले सोचा कि ये पोस्ट क्यूँ है यहाँ..?? फिर याद आया ये भानमती जी का कुनबा है..सो वो कहीं से कुछ भी शुरू और ख़त्म कर सकतीं हैं......फिर ये शब्द टाइप करते करते देखा...शीर्षक के पास लिखा था...''सुना-गुना''..........:)
    मैंने तो खैर..कभी इतना शिव जी को क़रीब से जाना नहीं..और शायद जानने का प्रयत्न भी नहीं किया..बस स्वयं को उनके क़रीब रखे रही.....:(..आप ही हैं...जिनकी मेहनत से मैं इतना पा रहीं हूँ.......अन्यथा कभी इंटरनेट पर ये सब नहीं खोजा.....हालाँकि सब कुछ उपलब्ध है नेट पर...:(

    ''वे वनों में मात्र साधना नहीं करते नृत्य और गायन के प्रथम आचार्य हैं''
    मात्र इस एक पंक्ति के लिए विशेष विशेष आभार...:) बहुत समय से कुछ तलाश कर रही थी..आपके शब्दों ने मुझे दे दिया.....:)

    और इस पोस्ट के लिए क्या कहूं.....बस अब सोने जाउंगी...इन शब्दों को गुनती रहूंगी....
    नमन है इस पोस्ट को.और भगवान शिव को...:)

    शुभ रात्रि !!

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