बुधवार, 29 दिसंबर 2010

स्त्री

*
कल हमारे पड़ोसी शास्त्री जी के बहनोई आये थे .
बातों-बातों में बोले -
'हमारे साले शास्त्री जी स्त्री  के बिना बिलकुल नहीं रह  सकते.  समझो बिलकुल बेकार हो जाते हैं.तो  हमेशा साथ लिये घूमते हैं .'
'क्या कह रहे हो ?'
'सच कह रहा हूँ .'
'अच्छा.तुम्हीं से सुना ,और तो कोई नहीं कहता ?'
 'तुम ख़ुद देख लो ,कोई कहे चाहे न कहे .सच तो सच ही रहेगा '.
किसी की समझ में ही नहीं आ रहा था .
'बहस करने से कोई फ़ायदा नहीं .तुम्हीं देखो ''शास्त्री" की "स्त्री" निकाल दो तो क्या बचा?'
 "शा" .
*

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

घर और घाट

*
मेरे साथ की एक प्रवक्ता खीझ कर कहा करती थीं ," साठ की हो जाऊं फिर किसी की नहीं सुनूँगी ...."

वह सोचती थीं साठ पार करते ही ,छूट मिल जाएगी !

कहती थीx ,"और रुके है थोड़े दिन .पार हो जाने दो साठ ,फिर तो जिसके साथ चाहें निश्शंक बोलेूँ . किसी से छिपा कर क्यों चौराहे पर खड़ी हो कर हँसूँगी, बोलूंगी ,

"अभी तो ज़रा सा किसी के साथ बैठ कर कुछ डिस्कस कर लिया तो लोगों की निगाह में तमाशा बन जाते हैं -ये कोई नहीं देखता कि हमारी उम्र क्या है , भावना क्या है . बस निगाहें तौलने लगती हैं ये क्या कर रही है,क्यों कर रही है !अपनी कुंठाएँ लाद देते हैं .अरे करूँगी क्या ,बात ही तो कर रही हूँ."

मैं खुद नहीं समझ पाती कि ऐसा क्यों होता है .

"एक उम्र के बाद तो कम से कम इस सबसे मुक्त कर दो ,एक व्यक्ति के रूप में- अपनी रुचियों के अनुसार निश्चिन्त हो कर जी लेने दो,"

अक्सर तो उसे चिढ़ा कर उकसाने के लिए के लिए हम लोग छेड़ देते पर उसके कहने में तथ्य था .

हर जगह याद दिलाते रहा जाय -तुम नारी हो ,तुम्हें नारी की तरह रहना चाहिए. .

ग्राम्य शब्दों में कहें तो ,"अरे ,औरत हो औरत,की तरह रहो !"

हमेशा याद दिलाते रहा जाएगा तुम औरत हो, तुमसे जो अपेक्षित है वही करो.और यह हम बताएंगे कि क्या करना कैसे रहना चाहिए .

स्वाभाविक रूप में सहज व्यवहार स्वीकार्य क्यों नहीं ? हमेशा दूसरों के हिसाब से चलें ,उनकी मानते रहें तो ठीक ! नहीं तो ,स्वेच्छाचारी ,निरंकुश, उच्छृंखल ,स्वच्छंद जैसे शब्द गालियां बना उछाले जाएंगे उस पर ! ऊपर से धमकी -न घर की रहोगी न घाट की !(सचमुच घर और घाट दोनों पर एकाधिकार है जिसका वह चाहे जो करे -कौन टोक सकता है उसे!)

जो स्वाभाविक है वही आचरण तो कोई करेगा याद दिलाने की ज़रूरत क्या है ?क्या किसी से कहा जाता है ,माँ हो माँ की तरह रहो ,या बहन हो बहन की तरह रहो .वह तो अपने आप होता जाता है .

इसी का दूसरा पहलू देखिये - ,पति हो पति की रह रहो (पत्नी पर शासन करते हुए)

,या आदमी की तरह (हमेशा तन कर सारे अधिकार समेट कर).

व्यक्ति का व्यक्ति से जो स्वाभाविक संबंध होता है-सहज, उदार .वह स्वीकार्य क्यों नहीं.एक महिला के लिए अपने आप में एक व्यक्ति होने की गरिमा,क्यों नकार दी जाती है ?

एक व्यक्ति के रूप में रहने का अवसर कभी क्यों नहीं मिले -अपने सारे दायित्व पूरे कर चुकने के बाद साठ पार - सत्तर पार कर के भी नहीं . स्त्री है सिर्फ़ इसलिए तमाम वर्जनाओं के साथ जीना उसकी नियति !इस उम्र तक जो अच्छी बनी रही तो अब कोई उसे बिगाड़ नहीं सकता ,और अगर बिगड़ी हुई है तो कोई उपाय उसे सुधार नहीं सकता- यही सोच कर निश्चिन्त क्यों नहीं रह सकते लोग !

*

गुरुवार, 25 नवंबर 2010

दोनों एक साथ

*



उस दिन पड़ोसवाली वंदना आई बोली ,' समझ में नहीं आता ,सुबह जल्दी-जल्दी के कामों में कैसे इनसे सहयोग लूँ ?'

'क्यों .मना करते हैं ?'

'मना नहीं करते ,कर भी देते हैं जब कहो तब ..पर मैं चाहती हूँ एक जिम्मेदारी ले लें कि में निश्चिन्त हो जाऊँ .हर समय हड़बड़ाई सी हर तरफ़ न दौड़ना पड़े '.

'उनके सुपुर्द कर दो ये तुम्हें करना है ,'

'हाँ, किया था मैं.किचन सम्हालूं और वे बच्चों के जूते-मोज़े ठीक कर दें ,उनकी बॉटल भर दें ,'

'तो ?'

'तो क्या ,ध्यान नहीं रहता. पेपर हाथ में ले लिया तो उसी में डूब जाते हैं,न्यूज़ सुनने लगे तो उसी के हो गये.फिर किसी से मतलब नहीं . काम करते-करते मैं ध्यान दिलाती रहूँ '.

'ये तो मैंने भी देखा है इन लोगों का दिमाग एक बार में एक ही तरफ़ चलता है.वन वे ट्रैफ़िक .'

'और किचन से चिल्लाऊँ तो वहीं से क्या-क्या करते रहेंगे . जाकर कहूँ तब पूछेंगे- क्या ?'

रोज़-रोज़ की वही कहानी .

सच्ची बड़ी मुश्किल है

किचन में काम करते पर कहाँ-कहाँ ध्यान रखे और , धीरे से कोई सुनता नहीं .

रोज़-रोज़ की चीख-पुकार से तंग आकर उसने एक उपाय निकाला

एक बोर्ड बना कर टाँग दिया - रोज़ शाम को लिख दिया जाय कि सुबह कितने बजे इन्हें क्या करना है . क्या करना है और वे अपने आप देख लेंगे .

बता भी दिया फ़ौरन तैयार हो गए .

टँग गया बोर्ड -

सुबह ,सात बजे देखना है बच्चे ब्रश कर रहे हैं ,

फिर आदि साढ़ेसात कर नाश्ते के लिए तैयार ,

पौने आठ से पहले स्कूल के लिए निकल जाना है .

निश्चिन्त हो कर वंदना नाश्ता लंचबॉक्स तैयार करती रहेगी बीच-बीच में दौड़ना -चीखना नहीं पड़ेगा .

*

सुबह का काम शुरू .

लंच बाक्स और नाश्ता तैयार कर रही है वंदना .

कहीं कोई आहट नहीं .

सुबह सात पैंतीस ,,,और पाँच मिनट,

तवा उतार कर गई .

अरे, सात सैंतीस हो गए ,तुम यहाँ निश्चिंत बैठे हो ....'

'तो क्या करूँ ?'

'क्यों बोर्ड पर लिखा है न !'

क्या लिख दिया बोर्ड पर, कहाँ?

बताया तो था ,इधर बेडरूम के बाहरवाली गैलरी में सामने. तुमने पढ़ा नहीं ..?'

'तुम बता दो हम उधर गए ही नही .'

बता दिया चलो ,दो-एक दिन यही सही ,

इतवार पड़ गया .सोमवार को फिर सात चालीस हो रहे थे ,ले जा कर बोर्ड सामने किया, 'हम क्या करें इसका ?'

'पढो '.

'शेव कर रहे हैं. चश्मा कहाँ लगा है तुम बता दो .'

बताया .

'अरे हाँ, अभी जा रहे हैं जरा टाइम और बता दो . और सुनो यहाँ तक आई ही हो तो हम तौलिया बेडरूम में भूल आये हैं ,ज़रा पकड़ाती जाना .'

'उफ़्फ़!

एक बार भी जो सुबह उठ कर पढ़ लें!एक बार घड़ी ले जा कर सामने कर दी '.

कहने लगे ,'घड़ी को क्या हुआ?'

'टाइम देखो.'

'हाँ हाँ ,देख लिया ,अरे सात बीस हो गये!अरे , पहले क्यों नहीं बताया . इत्ती देर में हम क्या-क्या कर लेंगे अभी तो हमने ब्रश भी नहीं किया !

'जरा तुम्हीं पहले से याद दिला दिया करो. हमने काम करने को मना किया क्या कभी ?'

हे भगवान !

वह पूछती है ,'तू ही बता अब मैं क्या करूँ - रोऊँ कि हँसूँ ?'

एक साथ, दोनों चलेंगे .

और मैं क्या कहूँ भला !

*

शनिवार, 30 अक्तूबर 2010

भूखा -

*


मेरा बेटा अपने छुटकन्ने-से भाँजे से लड़ रहा है .

बेटा कोई बच्चा नहीं 27 साल का बाकायदा सर्विस कर रहा इंजीनियर ,शादी भी हो चुकी है .

और मेरा नाती -3-4 साल का बच्चा ,अभी तुतला कर बोलता है .

वह कहता है ,'उठो यहाँ से .मेरी नानी हैं उनके पास मैं लेटूँगा .'

और मेरा बेटा आ लेटा है मेरे पास ,'मेरी माँ हैं मैं लेटूंगा. तुम जाओ अपनी मम्मी के पास !'

पर वह तो मुझ पर सिर्फ़ अपना अधिकार समझता है .

मामा से कह रहा है ,उसके कमरे की ओर इशारा कर के ,' वहां जाओ !'

'नहीं जाऊँगा ,मेरी माँ हैं. तुम जाओ अपनी मम्मी के पास.'

पर वह क्यों जाने लगा उसकी तो मम्मी की मम्मी हूँ  मैं ,दोहरा अधिकार !

 मुझे हँसी आ रही है .दोनों सही हैं मैं क्या बोलूँ?

एक तरफ़ एक तो दूसरी तरफ़ दूसरे को लिटा लूँ तो भी मुश्किल ,उसकी तरफ़ मुँह मत करो ,मेरी तरफ़ करो .

मूल तो अपना हई है ,पर ब्याज उससे भी प्यारा लगता है .

'जाओ वहां' वह फिर उसेकमरे का रास्ता दिखा रहा है .

'अरे, बेटा, वह बच्चा है , तुम्हीं रहने दो .'

'पर ये तो बराबर से लड़ता है माँ ,हमेशा सबके सामने भूखा,भूखा कहता है मुझसे.'

यह छुटक्का भी कुछ कम नहीं है .

मेरा बेटा किसी से ज़रा सा चिल्ला कर बोल दे तो ', हत् हत् हत्, भूखा कहने लगता है ,

पहले मेरे बेटे ने उसने विरोध किया फिर मुझसे शिकायत की ,'माँ ,देखो ये मुझसे भूखा कह रहा है!'
पर मैं क्या करूँ .इत्ता छोटा है इसे समझाऊँ कैसे

होता यह था कि मेरी बेटी की पहली संतान यही छुटक्का ,जब रात-बिरात रोना शुरू करता , तो वह खीझना-डाँटना शुरू कर देती .

मैं कहती ,'वह भूखा होगा इसलिये शोर मचा रहा है .'

'अरे माँ ,अभी तो दूध पिलाया है ,उसमें से भी छोड़ दिया .'

'ये बच्चे ऐसे ही झिंकाते हैं ,एक बार में पीते नहीं और ज़रा देर में फिर रोना शुरू ..'

मैं जानती हूँ यह सब झेले जो बैठी हूँ .

अरे ,बच्चे तो बच्चे ,यहाँ तो बड़े-बड़े ,भूखे होते हैं तो क्या रौद्र रूप दिखाते हैं !

मेरा यह बेटा छोटा था तब तो भूख लगने पर उपद्रव मचा देता था और अब भी ,जब खूब बड़ा हो गया है -पेट खाली होता है तो बात-बात पर उलझने लगता है .ज़रा-ज़रा बात पर लड़ जाता है .

मैं जानती हूँ न उसकी आदत !झटपट  खिला-पिला देती हूं और फिर सब ठीक !

तो मैंने कहा,' भूखा है इसलिये चिल्ला रहा है .'

सुन-सुन कर बच्चा अपने ढंग से समझने लगा .

मामा को चिल्लाते सुनता है तो कूद-कूद कर उससे 'भूखा-भूखा' कहता है .

वह चिढ़ कर मना करे तो,'हत् हत् हत् भूखा.' कहने लगता है .

और इसे शिकायत है कि ज़रा सा है और उसे' हत्-हत्' कर भूखा कह रहा है .

'जीजी देखो ,ये मुझसे भूखा कह रहा है .'

'मैं क्या करूँ भैया ,ये तो कन्नौज में पापाजी (अपने दादाजी) से भी .. '

आगे उसने बताया -

'एक बार तो हद्द कर दी इसने .

वहां पापाजी (बेटी के ससुर)किसी पर नाराज़ होकर चिल्ला रहे थे.

पहले तो यह देखता सुनता रहा फिर उनकी चारपाई पर चढ़ गया और उनकी ओर मुँह कर खड़ा हो कर उन पर चिल्लाने लगा,' भूखा,भूखा .'

वे रुक गये . तब वह भी चुप हो गया ,और जब वे फिर नाराज होकर अपनी बात कहने सगे तो

फिर वही उनके लिए,' भूखा,भूखा' कहना शुरू. .

उन्होंने मुझसे पूछा ,'ये क्या कह रहा है ?'

उसने फिर दोहरा दिया.

मैं कैसे बताऊँ !

उन्होंने फिर पूछा,'क्या कह रहा है यह?

'पता नहीं पापा जी ,जाने क्या बके जा रहा है .कहीं से सुन आया होगा .'

बड़ी मुश्किल से इसे बहला कर वहां से ले गई .'

वह भी बेचारी क्या करती !

मैंने तो देखा है उधिकतर बच्चे भूखे होने पर क्या उपद्रव मचाते हैं .
लड़ाई-झगड़ा ,मार-पीट तक पर उतारू  ,

 मेरा तो पोता भी ऐसा ही है .सबसे लड़ने पर आमादा हो जाता है और उदर पूर्ति होते ही परम संतोष. फिर मिल कर हँसना-खेलना शुरू .वही बात -पेट में पहुँचा चारा तो हँसने लगा बिचारा !'

सही कहा  है - 'बुभुक्षितम् किम् न करोति पापं .'
*

रविवार, 10 अक्तूबर 2010

क्यों ?

*
1.
समझ में नहीं आता कि स्त्री हमेशा विवश बनाये रखने की कोशिश क्यों की जाती है ,उसे परमुखापेक्षी देखने में शायद पुरुषोचित अहं की तृप्ति होती हो !
पुरुष का क्षेत्र जितना व्यापक हो उतना अच्छा .स्त्री का जितना सीमित हो सके कर दो .घर में सीमित  रहे .और पति की सेवा के अलावा और कुछ न जाने तो सर्वश्रेष्ठ !
स्त्री को आनन्द के रस से इसलये वंचित कर दिया कि एक बार यह स्वाद लगने के बाद संसार फीका लगने लगता है ।वह संसार में उलझी रहे और पुरुष मुक्ति का स्वाद ले सके इसलिये सारे संयम नियम ,मर्यादायें,उत्तरदायित्व उस पर लाद कर वह निश्चिंत होगया कि चलो दुनिया के सारे काम चलते रहेंगे सब-कुछ मेरा होगा और मैं मुक्त रहूँगा ।उसके के साथ रोना और आँसू क्यों जोड़ दिये गये हैं?सीता को रोते हुये दुःखी दिखाना ,मूवीज़ में ,कहानियों में हमेशा रोती धोती औरतें! ।माँ है ,तो रो रही है. पत्नी है, तो दुख सहन किये जा रही है,बहन है तो त्याग करना उस का कर्तव्य है .रोना और सहना उनकी नियति है क्यों हँसती हुई प्रसन्न महिलायें क्या अच्छी नहीं लगतीं ?
अगर संसार में रोने का ठेका स्त्री से ले लिया जाय और उसे हँसते हुये और प्रसन्न रहने की सुविधा दी जाय तो संसार अधिक सुन्दर अधिक संतुलित और मन-भावन हो जायेगा !
*
2.

*
अम्माँ जी खाना खा चुकी थीं. 
अब दाँत काम नहीं देते .ज़रा सी कड़ी चीज़ भी चबाते नहीं बनती फिर ये तो सुबह की बनी रोटियाँ .थाली में रखी-रखी और सूख गईँ थीं .कोरें अलग कर अम्माँजी ने बाकी रोटी दाल में भिगो कर 
उठीं तो थाली में रखी , सूखी कोरें हाथ में समेट कर चल दीं .

बहू ने तीक्ष्ण दृष्टि से देखा,' जे का अम्माँ जी ,रोटी की सूखी कोरें ,विनीता की अम्माँ को दिखाबे जाय रही हो ?''

झुर्रियों से भरा चेहरा उठा, बहू को देखा बोलीं ,.'नाहीं बहू,हम काहे को दिखाने लै जाएँगी?,ई हमसे चबाई नहीं जातीं सो निकाल कर रख दीं .अब बाहर चिरैयन को डाल देंगी .अन्न काहे फिंके ,किसी परानी के पेट में चला जाए .'

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

हवा में मैटर

*


अब भी वह मैटर कभी-कभी हवाओं के साथ उड़ आता है .

एक बार प्लान बनाया था -पूरा नकशा नहीं बना था, बनने की प्रक्रिया में था .

हुआ यों कि उपन्यास साहित्य पर बहस चल रही थी .अचानक मन में आया एक उपन्यास लिखें मिल कर -एक लेखक एक लेखिका .

विभाजन के चार सूत्र हो सकते हैं -

1 पुरुष पात्रों का काम पुरुष लेखक करे ,नारी पात्रों का लेखिका .

2. पुरुष पात्रों का लेखिका करे और नारी का लेखक

3 एक-एक अध्याय बारी-बारी से- एक जहाँ से छोड़े वहाँ से दूसरा उठाए .

4 एक प्रारंभ करेगा.दूसरा समापन .

भाषा-शैली में अनुरूपता रखी जाए कि पढ़ने वालों को झटके न झेलने पड़ें.एक-दूसरे के अनुकूल बने रहने की लगातार कोशिश करें .

मन में मैटर जमा होने लगा .

पर योजना धरी की धरी रह गई .

मैटर कभी समाप्त होता है क्या -किसी-न किसी रूप में कभी-न-कभी ढल ही जाएगा .
*

मंगलवार, 21 सितंबर 2010

मैं लिख दूँगा !

***


दृष्य- 1

हमने सुना है इस बीरन सिंग ने भाषण लिखने का काम तुम्हें सौंपा है ?

हाँ मुझसे कहा गया है . लिख दूँगा ,जाने कित्ते भाषण लिखे हैं .इन चुनाव लड़नेवालों को कुछ आता-जाता थोड़े है ,औरों के दम पर पलते हैं

लिख तो तुम दोगे ,वाहवाही उनकी करवाओगे .और पता है इस आदमी ने किया क्या है?

क्या किया ?

क्या नहीं किया उसने ये पूछो उसमें .हमारी गाँव की ज़मीन हथिया ली इसने .जाने कितने गुंडों का पाल रखा है ,

अच्छा !
ये  जो नेताजी का भट्टा है ,इसकी असलियत पता है.भट्टा क्या बदमाशों का अड्डा है .दिन में ईँटें पथती हैं औऱ रात में ट्रक लेकर डाका चालने निकलते हैं .
नेता जी के भतीजे की बस है ,लािसेंस की क्या ज़रूरत इन्हें !सालों ऐसी ही चलती है .हम तो कई बार इस पर आए गये हैं ..बैसे भी हमें कभी चिकट नहीं लेना पड़ता .
ससुरे सब बदमाश हैं .हत्या ये करवाएं .डाके ये डलवाएं .
लोगों को उठा लाते हैं और सँदेसा भइजवा देते हैं ,इतने पैसे ,इतना धन यहाँ रख जाना ..
अरे अभी पिछले साल मसहूर डाक्टर को ग़ायब कर लाए .पिस्तौलबाज़ी से कोई घायल हुआ होयगा अपना आदमी .या किसी का पेय गिरवाना होगा .अदावत तो चलती ही रहती है .
जब जरूरत हुई किसी डाक्टर या लेडी डाक्टर को पकड़ लाते हैं .
और तुम मेरे दोस्त ,उसी की वाह-वाही कराओगे ?

तुम चाहते क्या हो ?

पिटे या मुँह काला करके जाए यहाँ से.

पढ़ा-लिखा है ?

आठवीं पास .पैसे और गुंडों के बल पर बना बैठा है .

जाओ, हो जाएगा तुम्हारा काम .

कैसे?

सब समझा दूँगा .

*

दूसरा दृष्य (उम्मीदवार के भाषण का ताम-झाम) .

एक आदमी -,काहे कित्ती देर हैं ,बीरन बाबू अभै आये नहीं ?

दूसरा- चल पड़े हैं हुअन से.बस पाँचै मिन्ट में पहुँचन वारे हैं .

तैयारी तो पूरी है .

हम होयँ और काम में कसर रहि जाय .अइस कइस हुइ सकत है .

अरे ये लाठा-आठी कहे को ,

गाँव के लोग लाठी बिना कइस चलें .मारग में कुत्ता ,पीछे लगि जाय तौन ..

एक -अरे ऊ तो हमार गाम केर मानुस है ,नेताजी का गाँव .निसाखातिर रहो .

लो ,आगए ,आ गए ..

सब चुप होकर बैठ गए .

नेता जी ने अपना भाषण शुरू किया ,'मैं सालों से यही कहता रहा हूँ कि आज जो ...'

आगे की तीसरी पंक्ति से एक आदमी चिल्लाया ,'गाली दे रहा है ,देखो तो जरा !

एक और चिल्लाया -हम भाषण सुनने आये हैं -गाली-गलौज सुनने नहीं !

क्या कहा ?

साला -साला कह रहा है सबन को .

सच्ची? ,

अरे अभी तो कहा ,कहो फिर कह दे .

हमें साला कह रहा है ....दो तीन लोग उठ कर खड़े हो गये -क्या कहा ,क्या कहा ..?

अरे अभी अभी तो कहा.

क्या बात है भई ,पीछे आवाज़ नहीं जा रही क्या ?..

.फिर से कहिये ।कुछलोगों ने नहीं सुना ।

मंत्री जी और ज़ोश से चिल्लाये ,'सालों से कह रहा हूँ ..अब तो सुनाई दे रहा है ?'

उन्होंने फिर से भाषण शुरू किया ,हाँ तो ज़ोर-जोर से बोल रहा हूँ कि सब सुन लें , मैं यही बात सालों से कह रहा हूँ

क्या कह रहे हो मंत्री जी. फिर से तो कहना -

अरे चीख़-चीख कर कह रह हूँ -सालों से कह रहा हूँ हाँ,सालों से .

देखा,बराबर कहे जा रहा है !

हाँ ,बराबर गाली दिए जा रहा है..हम लोग चुप्पै सुनते रहेंगे का इनकी गालियाँ?

क्यों महावीरे ?

महावीरे के साथ दो-चार लोग और उठ खड़े हुए .

एक चिल्लाया-हम गालियाँ सुनने नहीं आए हैं .

बैठों में से किसी ने पूछा-हाँ, सच्ची गाली दे रहा है

और क्या झूठ बोल रहे हैं हम ?लेओ फिर से सुनवाए देते हैं .

स्टेज से मंत्री चिल्लाए .ये क्या गड़बड़ हो रहा है ,आप लोग चुप्पे सुनिए हम बड़े मार्के की बात कहने वाले हैं

सुरू वाला इन लोगन ने सुन नहीं पाया सो मार चिल्लाय रहे हैं ,

सुरू की लाइने फिर से बोल देओ

ओहो ,कित्ती बार कहें कही बात ?,चलो फिर से कहे दे रहे हैं ,अब साफ़ सुन लेना सालों से ....

फिर तो हल्ला मच गया .लोग खड़े होने लगे.

कुछ लोग स्टेज पर चढ़ गए .अफरा-तफ़री मच गई .घेर लिया उन लोगो ने .

नेता चिल्ला रहे हैं .सफ़ाई दे रहै हैं कौनो नहीं सुन रहा ,कुछ तो बड़े उत्तेजित हैं.

वे गिड़गिड़ा रहे हैं- हमार ई मतबल नहीं रहे .

हाथ जोड़े घिघिया रहे हैं .उन्हें बचानेवाले ,पुलिसवाले सब भकुआए इधर-उधऱ भाग रहे हैं .

ई नेता की दुम पबलिक का गाली देता है .

हो रही है मरम्मत मंच से नीचे खींच कर .पुलिस छुड़ाए-बचाए तब तक गत बना डाली लोगन ने .

दोनों दोस्त किनारे खड़े हैं .

क्यों ,अब तो खुश,हो गई मंशा पूरी ?

कमाल कर दिया !

आज तुम्हार अक्कल का लोहा मान गए .

चलो अब काफ़ी हो गया .

फिर दोनों लोग पहुँच गए और लोगों से छुड़ा लाए नेता को, चच्,चच् करते सहानुभूति दिखाते.

अरे ई लोग ठहरे गँवार ,आप कहाँ ढँग की बात कहि रहे हो .चलिए चलिए .सब उजड्ड हैं कौनो बात करने लायक नहीं .

ले गए नेता जी को हल्दी डाल के गरम दूध पिलाने.

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शनिवार, 4 सितंबर 2010

केवल महिलाओं के लिए

* (कुछ उपयोगी सुझाव)

जिस समय पति से  घर का कोई काम करा रही हों -

* 1 . उस समय आपको खाली नहीं रहना चाहिए कुछ करती हुई ही दिखाई दें.चाहे दूसरे कमरे में चली जाइये वहाँ चाहे जो चाहें करिए .चले जाना इसलिए भी अच्छा है कि काम करने का उनका ढंग देख कर आप बिना टोके रह नहीं पाएँगी (बेकारमें  कहा-सुनी होने लगे तो जो काम कर रहे हैं उससे भी जाएँगी).
* 2 . दिखना  यही चाहिए कि आप व्यस्त हैं .कुछ पढ़ना ही चाहें तो कोई कपड़ा और सुई-धागा सामने कर के, कोई देखे तो लगे कि कुछ सिलाई चल रही हैं.
* 3 .इधर आना हो तो हँसती हुई कदापि न आएं ,खुश न दिखाई दें नहीं तो वे समझेंगे मुझसे काम करा के खुश हो रही है .
* 4 . थोड़ा सा मुँह बना लें तो और अच्छा  .किसी बात पर हँसी भी आए तो दूसरी जगह जाकर हँस आएँ ,इधर आने पर गंभीर होना या मुँह ज़रा चढ़ा होना फ़ायदेमंद है  .इससे उनकी हिम्मत नहीं पड़ेगी कि कहें  'ज़रा यह उठा दो '',वो रख दो' .नहीं तो जब तक कुछ करेंगे आपको बराबर घेरे रहेंगे.
**

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

चलती चक्की

*
'चलती चक्की देख कर दिया कबीरा रोय...'
अगर कोई चलती चक्की देख कर रो दे, तो कोई क्या करे !
उसकी बेवकूफ़ी !
 चक्की तो चलेगी ही ,दाने पिसेंगे ,नहीं तो लोग खायेंगे क्या?
ऐसे, जीवन कैसे चलेगा !
ये तो दुनिया की रीत है ,सृष्टि का नियम .तुम दाना बनने के बजाय चक्की के पाट बनो जो काम कर रहा है ।या भोक्ता बनो ,पोषण प्राप्त करो .
देखो कबीर, चक्की चलानेवाले हाथों को कभी देखा? उनके बारे में सोचते जो घूमते हैं भारी पाटों को खींचते हुए
तुम्हारी भूख शान्त करने को . .कभी ख़ुद भी चला कर देखो,कबीर .

वाह रे  !कभी चलती  चक्की देख कर रोते हो ..कभी ,जागते हो और रोते हो
' सुखिया सब संसार है खाए अरु सोवै ,
दुखिया दास कबीर है जागे अरु रोवै '.
दुनिया में आये हो तो रो-रो कर मत रहो , हिम्मत से काम लो !
यह तो सारी दुनिया चलती हुई चक्की है
 यह तो यहाँ का क्रम है ।पत्ते झड़ेंगे ,दिन डूबेगा ।फिर वसंतऋतु आयेगी ,रात के बाद फिर सुबह होगी ।
तुम तो जानते हो -
'सुर नर मुनि अरु देवता ,सप्त-दीप, नव-खंड,
कह कबीर सब भोगिया देह धरे को दंड.'
देह धरी है ,दंड  भुगतना ही पड़ेगा- रोकर ,चाहे हँस कर !
*!

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

लाचार आदमी !

एक ख़बर-
 आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने परीक्षा में नकल करने के आरोप में पांच जजों को निलंबित कर दिया है। वारंगल जिला स्थित काकतीय विश्वविद्यालय के आर्ट कॉलेज में 24 अगस्त को मास्टर ऑफ लॉ [एलएलएम] की परीक्षा के दौरान अजीतसिम्हा राव, विजेंदर रेड्डी, एम. किस्तप्पा, श्रीनिवासआचार्य और हनुमंत राव नाम के जज नकल करते पकड़े गए।
विश्वविद्यालय के अतिरिक्त परीक्षा नियंत्रक एन. मनोहर के अनुसार, ये जज कमरा नंबर 102 में परीक्षा दे रहे थे तभी उनके नेतृत्व में एक दल औचक निरीक्षण पर वहां पहुंच गया। इन जजों में से एक ने कापी के अंदर कानून की किताब छुपा रखी थी और उससे नकल कर रहे थे। अन्य जजों के पास से लिखी हुई पर्चियां और पाठ्य पुस्तकों के फाड़े हुए पन्ने बरामद हुए। निरीक्षकों ने इन सभी चीजों को जब्त कर लिया और जजों को आगे लिखने से रोक दिया.'
क्यों क्या जज इंसान नहीं होते ?
परीक्षा के तो नाम से ही दम खुश्क हो जाता है .और क्योंकि  परीक्षा दे रहे थे, उस स्थिति में वे केवल परीक्षार्थी थे .न जज थे न मुवक्किल ,न वकील .अगर परीक्षा-कक्ष में जज होते तो तो जजमेंट का काम उनका होता ,वे स्वयं किसी के निरीक्षण  के अंतर्गत नहीं होते .
परीक्षा देने की मानसिकता ही अलग होती है .और अचानक निरीक्षण !
बिना वार्निंग के तो गोली भी नहीं चलाई जाती .पहले बता देना था . अब उनका जजमेंट कौन करेगा .साधारण आदमी  जजों का न्याय करे इससे बड़ा अन्याय उन पर क्या होगा .
तरस आ रहा है मुझे तो उन बेचारों पर .
जब राजनीति के ऊँचे-ऊँचे लोग न्याय से ऊपर होते हैं तो एक जज तो वैसे भी न्याय से ऊपर हुआ .न्याय तो एक प्रक्रिया है ,जिसे करनेवाला वह ख़ुद है.
कोई बंद आँखोंवाला पात्र  न्याय का तराजू सँभाले है - और बेचारा जज ,लाचार आदमी !

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

चिन्ता तुम कहाँ हो ?

*
. उस दिन एम.ए. फाइनल की कक्षा लेकर डिपार्टमेंट की ओर जा रही थी कि चिन्ता पीछे आती दिखाई दी .क्लास की बड़ी सजग छात्रा है .ऐसी छात्राओं को पढ़ाना अच्छा लगता है . 
साहित्य का इतिहास पढ़ाते समय राम-काव्य और कृष्ण काव्य परंपराओं  की परवर्ती रचनाओं में बदलती हुई दृष्टियों और सामाजिक संबंधों के तेवर कैसे बदल गये हैं यह स्पष्ट करते  बदलते हुये समाज में नारी के प्रति बदलते हुये मानों का विश्लेषण के साथ  ,सीता और राधा की बात अनायास ही आ जाती है ।वाल्मीकि की तेजस्विनी सीता तुलसी के कव्य में कितिनी निरीह बना दी रई है ,और कृष्ण काव्य में बाल्यवस्था की सखी राधा को परकीया बना कर  कितना महत्व दिया गया  है यही बातें चल रही थीं ।
'मैम मैं कई बार आपके पास आने को हुई पर आप बिज़ी थीं या आपके साथ कोई -न -कोई होता था.मैं आपसे कुछ डिस्कस करना चाहती हूं . '
'हाँ,हाँ ,आओ चलो बैठते हैं .

'देखिये सीता के भक्त कितने हैं और राधा के ..सारी कृष्ण भक्ति राधा से भरी पड़ी है ,कहीं -कहीं तो केवल राधा, कृष्ण भी पीछे रह गये .कैसी है पुरुष-वृत्ति !हमें उपदेश दें सीता का अनुकण करो और खुद राधा के पीछे दौड़  जायँ ?
मुझे हँसी आ गई ,वह भी मुस्करा पड़ी ,
'देखो ,चिन्ता !एक बात भक्ति में राधा -भाव का महत्व है  पर बाद मे  कवियों ने राधा -कृष्ण के बहाने अपनी वासना कथा में रंग भरते गये .' 
हम दोनों खुल कर हँस पड़े  .
मैं उसका मुँह देखती रही .बहुत सचेत छात्रा थी वह ,काफ़ी कुछ पढ़ा था उसने  अध्ययशीला थी .ऐसी छात्रायें बहुत दुर्लभ होती जा रही हैं .उम्र में अन्य कक्षा की अन्य छात्राओं से थोड़ा बड़ी बड़ी ,विवाहिता भी .अक्सर ही काफ़ी उम्रदराज़ लड़कियाँ ,खाली बैठे की बोरियत से छुटकारा पाने को हिन्दी में एडमिशन ले लेती हैं -बैठे-ठाले एम.ए. हो जायें ,क्या बुरा है .
  
कभी-कभी क्लास में कसी बिन्दु पर वह कुछ पूछती और विषयान्तर हो जाता तो कुछ छात्राओं के चेहरे से लगता कि लगता यह  पढ़ाई में बाधा डाल रही है .
'देखिये न वाल्मीकि रामायण की सीता की सारी तेजस्विता और प्रखरता तुलसी के मानस में ग़ायब हो गई ।दीन और आश्रिता बन गई .'
'रचनाकार की अपनी दृष्टि है.'
'बहुत पहले जब हमारे प्रोफ़ेसर सा.ने लड़कियों की ओर देख कर कहा था -'सीता अनुकरणीया है राधा नहीं !'
 हमने कुछ नहीं कहा था, हमारा समय दूसरा था .
और आज मेरी छात्रा  प्रश्न कर रही है .

 छात्राओं से सब-कुछ नहीं कहा जा सकता .एक सीमा में रह कर ही पढाना है .
मैंने  जो कहा वह किसी एक के लिए नहीं, समाज की मान्यताओं के लिये कहा ।मुझे जो मिला था वही उपदेश मैनें  दे दिया .

कभी-कभी  स्वयं से पूछती हूँ  मैं इन्हें कुछ उल्टा-सीधी तो नहीं पढ़ा रही! जो परंपरा से चला आ रहा है उसे आगे बढ़ाना है अगर लीक से हट कर इनका स्वतंत्र व्यक्तित्व बन गया तो बहुत से प्रश्न उठ खड़े होंगे ,जिनका समाधान किसी के पास नहीं .
इतना और ऐसा सोचनेवाली लड़की कितनी सुखी होगी !

बहुत कुछ जानना  चाहती हूँ .
पर चिन्ता ,तुम हो कहाँ ?

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

दोषी हम ही हैं

मुझे लगता है हमारी धर्म की धारणा कुछ कुण्ठित हो गई है .उसे हम भक्ति से या कर्मकाण्ड से जोड़ देते हैं ।लेकन भक्ति अलग चीज़ है धर्म अलग.
धर्म वह कल्याणकारी तत्व है जो धारण करता है -व्यक्ति को ,समाज को ,और जगत को .भक्त किसी विशेष का होता है ,हृदय से उस विशेष के प्रति समर्पित होकर ,सिर्फ़ उसी के प्रति ।पर धर्म सब को अपने दायरे में समेटता है .सबके अपने अपने ढंग हैं धर्म को आचरण में लाने के -भक्त बन कर ,ज्ञान के द्वारा ,और कर्म से इन तीनों में कोई अंतर्विरोध नहीं -तीनों मिल कर पूर्ण होते हैं.
कोरी भक्ति व्यक्ति-परक हो जाती है .'वह उनका भक्त है' कहने मैं एक व्यंग्य की ध्वनि छिपी है .मतलब वह उनके हर काम की वाह-वाही करेगा बिना सेचे समझे ।कमियों या त्रुटियों को उजागर करना, समझना चाहेगा ही नहीं .उसे लगता है इससे भक्ति कलंकित होगी (अंग्रेजी में इनके समानान्तर डिवोशन और डिवोटी शब्द हैं,लेकिन उनसे निष्ठा व्यक्त होती है). आज की दुनियाँ में बौद्धिकता की प्रधानता है विवेक से निर्णय करने की अपेक्षा की जाती है -विशेष रूप से प्रबुद्ध वर्ग में .गुणों के वर्णन में वह दोषों को भी विशेषताओं और गुणों के रूप में दिखाना चाहता है या उनके उल्लेख से ही कतरा जाता है . यह हठधर्मी उसका स्वभाव बन जाती है .और महिमामंडन में सारी सीमायें लाँघ जाते है (सती प्रथा ,या राम का रावण की बहिन या अपनी पत्नी के प्रति व्यवहार,विष्णु का तुलसी,बालि आदि से छल करना )।सार्जनिक दृष्ट से जो कुछ अनुचित है उसका महिमामंडन आगे जा कर ,उपहास और कौतुक का कारण बन जाता है .
शुरू में महिमा मंडन की चौंध में कमज़ोरियाँ भले ही दखाई न दें पर यही हठधर्मी आलोचना का हेतु बनती है और लोग कहते हैं आपके धर्म में तो ऐसा होता है जब कि यह पात्र का दोष है धर्म का नहीं ।हमारे यहाँ पक्का भक्त वह है जो आराध्य की कमियों को सुनना भी न चाहे ,समझना तो बाद की बात है .यहाँ वह गाँधी जी के तीन बंदरों का अनुकरण करता है ,आपने इष्ट की त्रुटि या आलोचना ,न देखो ,न सुनो ,न बोलो ।लेकन ज़माना देखने सुनने ,साबित करने का है ,अंधविश्वास का नहीं ,यहीं हम धर्म के आलोचकों से मात खा जाते हैं और रक्षात्मक मुद्रा में आ जाते हैं .
एक तो तमाम रूढियाँ,बाह्याचार ,और थोपी हुई मान्यताएं धर्म के नाम पर घुस आई हैं और मूल भावना को आच्छन्न कर लिया है .इसके दोषी भी हमी लोग हैं तभी अपने धर्म पर ओरों के आक्षेप सुनने पड़ते हैं .

बुधवार, 21 जुलाई 2010

क्लोनिंग

इधर क्लोनिंग के विषय में बहुत कुछ सुनने में आ रहा है .वनस्पतियाँ तो थीं ही अब ,जीव-जन्तुओं पर भी प्रयोग हो रहे हैं और सफलता भी मिल रही है .
क्लोनिंग की बात से मन में कुछ उत्सुकता और कुछ शंकायें उत्पन्न होने लगीं ।
एक कोशिका से संपूर्ण का निर्माण? शरीर या भौतिक स्वरूप निर्मित हो सकता है लेकिन उसके भीतर जो प्रवृत्तियाँ ,मानसिकता और आत्म तत्व है -उसका व्यक्तित्व और उसकी अपनी अस्मिता - वह भी उस निर्मित शरीर में अपने आप आ जायेंगे ?
चेतना के विभिन्न स्तरों में मानव सबसे उच्च स्तर पर है,बुद्धि का विकास और चैतन्य के गहन स्तरों तक (कोशों के हिसाब से देखें तो मानव अन्नमय और प्राणमय कोष से आगे बढ कर मनोमय,विज्ञानमय तक पहुँच रहा है और आनन्दमय कोष भी उसके लिये अछूता नहीं है जब कि पशु जगत तक की सृष्टि निम्न स्तरों तक सीमित है ।
खनिज ,वनस्पति और पशु इस सीढ़ी के क्रमशः निचले पायदानो पर हैं . जब तक चेतना धुँधली पड़ी है शरीर का यांत्रिक संचालन संभव है ,ऐसे तो मुर्दों को भी संचालित कर ज़ोम्बी बना कर उनसे काम लिया जाता है पर वह उनकी अपनी चेतना नहीं है
।पौराणिक कथाओं में रक्तबीज का प्रकरण आया है -रक्त की एक बूँद से संपूर्ण काया विकसित हो जाती है ।वह स्वाभाविक प्राणी नहीं है(उसे क्लोन कहना अनुचित नहीं होगा)। किसी विशेष उद्देश्य के लिये उसे विकसित किया गया है ,वह उद्देश्य पूरा होने के बाद उसका कोई भविष्य नहीं ।रक्तबीजों में से कोई बच गया हो तो वह मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों से संचालित होगा या नहीं ,वह प्रजनन करने में समर्थ है या नहीं , क्या अपनी अस्मिता का भान उसे है, आत्मबोध से संपन्न है,एवं आत्म-विकास का उत्प्रेरण उसमें होता है या नहीं ,ये सारे और भी अनेक प्रश्न अनुत्तरित रह गये हैं ।
नई सृष्टि प्रक्रिया अपनाने से पहले उत्तरों को खोज लेना -कम से कम मुझे- उचित लगता है।नई सृष्टि रचने से पहले उसकी भावी व्यवस्था पर विचार करना लेना रचयिता का दायित्व बनता है,विशेष रूप से जब बाकी दुनिया उससे प्रभावित होती हो।

मंगलवार, 20 जुलाई 2010

बोल कर देखिय़े -बां..डुं...ग.

मुझे ऐसे नाम बहुत अच्छे लगते हैं जैसे होनोलूलू,कुस्तुनतुनिया,कुंभकोणम्,कोडईकोनाल .,झुमरी तलैया ,वैसे बरेली भी ठीक है पर वहाँ के बाजार में झुमका गिरने का खतरा होता है ।पता नहीं कौन लोग हैं जो ढूँढ कर उठा लेते हैं ,मैने तो खोना ही खोना सुना है ।रोज कहीं न कहीं से शिकायत सुनने को मिलती है ।बरेलीवालों को मिलता होगा । चुपचाप रख लेते हैं किसी को बताते नहीं ।
बाँडुंग सम्मेलन के बारे तो सुना होगा ,अपनी इन्दिरा जी के ज़माने में ।बांडुंग सुन कर मुझे लगा जोसे कोई बड़ी सी चीज़ जलतरंग जैसी मधुर आवाज़ करते हुये पानी में डूब गई हो ।मैं मुँह से बार बार दुहराती थी -बांडुंग ,बांडुंग !इस अर्थ के लिये डुबक या गुड़ुप शब्द भी हैं पर उसमे वह मनोहारिता कहाँ जो बांडुंग में है ,उसमे लगता है जैसे पूरी डूबने पहले वाली स्थित हो ।गुडुम शब्द भी है पर उसमे लगता है जैसे चीज़ एकदम डूब कर तल में बैठ गई जब कि बांडुंग में धीरे धीरे भरते जाने और फिर पूरा डूबने की क्रमिक और उत्तरोत्तर गहरी होती और फिर लहरते हुये शान्त होने की ध्वनियाँ हैं ।बोल कर देखिये- बांडुंग !
झुमरी तलैया अपने देश का ऐसा स्थान है जिसका नाम सुनते ही आभास होने लगता है कि शीश पर झूमर लगाये बालायें तलैया में कलोल कर रही हैं ।नीचे के जेवर दिखाई नहीं देते पानी में हैं न सिर का झूमर और उसके प्रतिबिम्ब लहराते झूम जाते हैं ।यह तलैया पुराने ज़माने में बहुत बड़ी रही थी ,फिर लोकमानस की रसिकता के साथ साथ सिमटती गई ,पता नहीं अब कितनी बची है ।जाने कितनी नदियाँ तालाब सूख गये पर उनके नाम अभी बाकी हैं ।झुमरी तलैया अब भी है और आगे भी बनी रहेगी ।

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

बेल का शर्बत बनाने की विधि -मर्दानी ---

आप बेल का ऐसा शर्बत बनाना चाहते है जिसे पी कर सारा परिवार ऐसा तृप्त हो जाए कि दुबारा आपको शर्बत बनाने की जरूरत ही न पड़े । तो लीजिये तरकीब हाज़िर है --
एक अच्छा पका हुआ कागज़ी बेल लीजिए ।उसे हाथ मे पकड़े-पकड़े घुमाते हुए आवाज़ लगाइए ,'हम बेल का शर्बत बनाने जा रहे हैं - किसे-किसे पीना है ?"
ज़ाहिर है शर्बत पीने मे किसी को आपत्ति नहीं होगी ,सब तैयार हो जाएंगे ।उसी प्रकार बेल को घुमाते हुए आवाज़ लगाइये ,'अरे कोई है इधर ?ज़रा पानी ले आना ।."बच्चे सुनकर अनसुनी कर जायेंगे.अच्छी तरह जानते हैं आपकी आदत. सब अपने-अपने काम मे लगे रहेगे .पत्नी पीनेवाला पानी लेकर हाज़िर होंगी ।आप ध्यान मत दीजिये ,आपको पानी से मतलब पीयें चाहे कुछ और करें ।
"जरा बेल पर डालो इसे धोएंगे ।'
बेल धोकर पकड़े-पकड़े ही पत्नी के सामने ज़ोर से ज़मीन पर दे मारिए ,बेल टूट जाएगा ।
"देखा कैसा बढ़िया बेल है ! ए-वन शर्बत बनेगा ।"
उनकी ओर देखिए ,वे उपकृत हो रही होंगी ।शायद वह चलने के चक्कर मे हों ,आप बोलना शुरू कर दीजिए ,'ज़रा भगोने मे चार-पाँच गिलास पानी देती जाना और एक चमचा भी ।'
आप इत्मीनान से कुर्सी पर बैठ जाइए ।सामने की मेज़ पर कुछ सामान रक्खा हो तो उठाकर कुर्सियों या सोफ़ेपर डाल दीजिए । मेज़ आपको चाहिये
पानी का भगोना आ जाय तो मेज़ पर रखवा लीजिए ।चम्मच से बेल का गूदा निकाल-निकाल कर पानी मे डालते रहिए ।आपके काम करने का ढंग देखकर पत्नी को ऊब लगेगी ,वह उठकर चल देना चाहेगी ।
आप रोक लीजिए ,'अरे जा कहाँ रही हो ,सुनो तो --।'
वह आपसे अच्छी तरह वाकिफ़ है रुकना नहीं चाहेंगी । पर आपको इस समय दबने की जरूरत बिल्कुल नहीं है ,' एक तो शर्बत बना रहै हैं ,हाथ गूदे मे सने हैं। अच्छा, हम अपने आप चीनी लिए लेते हैं । फिर ये मत कहना कि डिब्बा चिपचिपा रहा है या चीनी मे डले पड़ गए---।'
झख मार कर वह चीनी ला देगी । आठ -दस चम्मच चीनी भगोने मे डलवा लीजिए ।वह चीनी का डब्बा लेकर चली जाएँगी ।
आप थोड़ी देर बेल का गूदा निकालते रहिए ।उसे चीनी के साथ हथेली-अँगुलियों से मींज - मींज कर घोलिए । अब आवाज़ फिर लगाइए ,'अरे कोई है ?' एक बार मे कोई उत्तर नहीं मिलेगा । कोई उधर होगा तो भी नहीं सनकेगा ,डरिए मत चीखे जाइये ।
आवाज़ आएगी ,' अरे अब क्या है ?'
' इसे काहे में छाने ?'
'जग में छान लो ।'
'लेकिन जग यहाँ है कहाँ ?'
'ओफ़्फोह ,न लेकर बैठोगे ,न एक बार मे सब माँग लोगे !'
'अरे भई ,स्टेप-बाई-स्टेप चीज़ों की जरूरत पड़ती है ।कोई लिस्ट तो है नहीं हमारे पास , जो एक साथ माँग लें ।'
' हमारे हाथ अभी खाली नहीं हैं ,रसोई मे से उठा लो ।'
' अच्छा हम उठाए लेते हैं ,ये ज़मीन पर टपकेगा और हाथों से तुम्हारा और सामान गन्दा होगा फिर कुछ मत कहना ! हमे क्या -- हमतो तुम्हारी परेशानी बचा रहे थे ।हमी लिए आते हैं -- ' कहते हुए आप बैठे रहिए अगर चाहें तो हल्के से उठने का उपक्रम करके दिखा दें ।
जग आ जाएगा ।आप एकदम मुस्तैदी से बोलिये ,' ये छाना काहे से जाएगा ?'
' बड़ीवाली छन्नी से ।'
' कौन सी बड़ी छन्नी - जिससे गेहूँ छानती हो ?'
'नहीं जिससे सूप छानते हैं ।'
' वह छन्नी है कहाँ ?'
' रसोई मे टँगी है ।'
' हमारी तो समझ मे नहीं आता ,एक चाय की छन्नी है ,एक आटा छानने की ये सूप वाली कौन सी है ?'
हार कर वे छन्नी ला देंगी ।जग मे शर्बत छान लीजिये ।बच्चों को आवाज़ लगाइये ,' अरे ,चुन्ना मुन्ना ,बबली किट्टू कहाँ हो ?शर्बत पीना हो तो आ जाओ ।'
चुन्ना ,मुन्ना बबली किट्टू पुकार सुनते ही प्रकट हो जाएँगे ।
'गिलास तो ले आओ ।'
वे दौड़कर गिलास ले आएँगे , मेज़ पर रखवा लीजिए । पूछिए ,' बर्फ़ डालकर .या ऐसा ही ?'
वे झट् से फ़िज मे से बर्फ़ की ट्रे ले आएँगे ।
आप एक गिलास मे शर्बत भरिए उसमे बरर्फ़ डलवाइए ,'देखें , चीनी वगैरा ठीक है कि नहीं -- ' कहते हुए गिलास लेकर उठ जाइए ।
' सब लोग शर्बत लेलो जग में बना रक्खा है ।'
बेल का खपटा , बीजे ,छन्नी सब वहीं छोड़ दीजिए ,अपने आप उठ जाएगा ।
एक बात और कह दीजिए ,'बर्फ़ तुम लोग अपने-अपने हिसाब से डाल लेना ।'
आपके बनाए शर्बत से ऐसी तृप्ति मिलेगी कि दुबारा कोई बनाने को नहीं कहेगा ।

बुधवार, 30 जून 2010

लुगाइयाँ

*
ड्राइँगरूम में अखबार छाँट रही थी इतने में दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई ।मेरे पति किचेन में चाय का पानी रखने चले गये थे ,इस समय की चाय वही बनाते हैं और मैं चाय पीकर काम में लगती हूँ ।मैनें ध्यान नहीं दिया कौन आया है ,किचेन से सामने दिखाई देता दै , देख लेंगे अपने आप.
'अरे ,ये क्या हो रहा है?'
पड़ोस की शीला की ज़ोरदार आवाज़ सुन कर मैं चौंकी , कुछ दुर्घटना हो गई क्या? कहीं आग तो नहीं लग गई ?
अखबार फेंक कर मैं चिल्लाई ,'क्या हो गया ?
'अरे ,यहाँ क्या कर रहे हैं आप ?' शीला कफ़ी उत्तेजना में थी ,
'जाइये ,निकलिये आप !'
इतने में हड़बड़ाती हुई मैं पहुँची ,'क्या हुआ शीला ,क्या हुआ?'
'हुआ क्या ?भाई साब आप क्या कर रहे हैं यहाँ..यहाँ किचेन में?'
ये हकबका गए -
'ज़..जरा,चाय बना रहा था ।'
'जाइये ।हमें नहीं अच्छा लगता आप करे यह सब ।लाइये हम बना दें चाय।'
कहकर शीला मेरी ओर उन्मुख हुई ।
'उन्हें चौके में घुसा दिया,और आराम से वहाँ बैठी हो ?'
'आराम से बैठी हूँ !अखबार छाँट कर लगा रही थी ।पता है सुबह से क्य-क्या कर चुकी हूँ ?'
' उससे क्या फ़रक पड़ता है! मैं तो अभी की बात कर रही हूँ तुम यहाँ मज़े से न्यूज पढ रही हो और वो वहाँ धंधे में लगे हैं ।
मैने सोचा अगर मज़े से भी बैठी होऊँ तो इसे क्या परेशानी ।
पति हड़बड़ा कर चौके से बाहर आ गये थे ,झेंपे हुये से -जैसे चाय बनाना कोई अपराध हो ।
मैंने कहा ,'अच्छा, तो तुम चाय बना रही हो शीला ?ठीक मुझे यहीं पकड़ा देना और चाहो तो अपने लिये एक कप पानी और बढ़ा देना ।मैं तब तक अख़बार निपटा लूँ ।'
मैंने उसकी ओर देखा ही नहीं और बोलती गई ,' ड्राइँगरूम में लेती आना शीला ,यहीं पी लूँगी ।'
उसका बस चलता तो मुझे कच्चा चबा जाती ।
पता नहीं ये महिलायें इस टाइप की क्यों होती हैं और कैसे होती हैं । किसी दूसरी के आदमी को जहाँ घर का कुछ काम करते देखा उनका जी एकदम दुखने लगता है फ़ौरन दौड़ती हैं ,'अरे,अरे आप यह काम कर रहे हैं ।लाइये हम कर दें.'
पराये आदमी को उसके ही घर का काम करते देखना उनके लिये कष्टकर होता है ।उसकी पत्नी को सुनाती हैं,'अरे भाई साहब तो इतना काम करते हैं ,एक हमारे ये हैं जिनसे अपने आप गिलास भर कर पानी भी नहीं भी पिया जाता ।'
मैं सोचती हूँ -नहीं पिया जाता तो मैं क्या करूँ ?तुम जानो वे जाने ।हमारे यहाँ तमाशा क्यों खड़ा कर रही हो ?
चाहे बहिन हो चाहे भाभी .अपनी बहिन या ननद से उन्हें सहानुभूति नहीं होती ।ऐसे मौकों पर पराये आदमी का दुख देख उनका जी तड़प जाता है .बाढ़ की तरह सहानुभूति उमड़ती है और उसकी पृष्ठभूमि में चलती हैं अपने आदमी की शिकायतें !बड़ी उलाहने भरी टोन होती है ।उनका बस चलता तो इस पराये पुरुष की जगह अपने ब्याहे को काम निबटाने के लिये ला खड़ा करतीं ।
पर दूसरी महिला और अपना पति तो उस समय कटघरे में खड़े होते हैं ।
अगर महिला काम के बोझ से पिसी जा रही है तो वह उस पर दया का प्रदर्शन कर कुछ चैन पा लेती हैं ।कहेंगी ,'देखा बिचारी को !इतना भी टाइम नहीं कि चैन से खाना खाले !'
उनका मन हल्का हो जाता है ।।
'लेकन उस बिचारी के पति अगर काम में हाथ बँटाने लगें तो उन पर जैसे आसमान टूट पड़ेगा । सारा बिचारापन उसके पति के लिये रिज़र्व हो जायेगा ।कोई-कोई तो सीधे उसके सामने अपने पति से झींकने लगेंगी,'देखो भाई साहब कितना काम करवाते हैं ,और एक तुम हो !'
पति बेचारा चुप !क्या बोले ?रहना तो घर में उसी के साथ है .जल में रह कर मगर से बैर कैसे करे !इधर महिलायें करुणामयी होती हैं उन्हें करुणा करने के अवसर चाहियें . दूसरी महिला की स्थिति दयनीय नहीं होगी तो उन्हें दया करने का मौका कहाँ मिलेगा ।और पराया आदमी ? वह जैसा है बहुत अच्छा है।दूसरे की थाली का लड्डू हमेशा अपने से बड़ा दिखाई देता है ।पराये पति के लिये सहानुभूति के भंडार भरे हैं जिन्हें खोलने से उसकी पत्नी का सिर जतना नीचे झुकता है सहानुभूतिमयी का उसी ही कोण पर ऊँचा उठने लगता है । दूसरी औरत पर तरस खा परम तोष का अनुभव होता है ।
और अगर उनका अपना पति कभी काम कराने को तैयार भी हो जाय तो उन्हें विश्वास है कि यह आदमी कुछ नहीं कर पायेगा ।बात - बात पर टोकती चलेंगी अगर में कुछ करे तो उन्हें बराबर चिन्ता खाये जायेगी -'लेथन फैला रहा है ,कुछ भी ठीक नहीं कर रहा है।'' गैस बेकार फुँक रही है ,घी-तेल की बर्बादी हो रही है ।'तुम रहने दो ,और मेरा काम बढ़ा कर रख दोगे'जब तक आदमी किचेन से बाहर नहीं जायेगा लगातार टोकती रहेंगी ।
अंत में हार कर वह कह देगा ,'लो सम्हालो अपना किचेन ,मेरे बस का नहीं ।'
बस !यही तो वे चाहती हैं ।यही बताना चाहती हैं कि यह सब उसके बस का नहीं ।सच है अगर उसके बस का हो जाये तो इनकी क्या इम्पार्टेन्स रह जायेगी ?
उन्हें पराया आदमी काम करता हुआ बड़ा सुघड़,कुशल और सलीकेवाला लगता है और अपना निरा निखट्टू ,लापरवाह और बे-शऊर !पराया आदमी बड़ा सुशील, बड़ा निरीह और अपना मरद बिगड़ैल बैल दिखाई देता है । मुँह से चाहे न कहें मुद्रा से सब व्यक्त कर देती हैं ।
अगर कुछ कहो तो साफ़ जवाब है -मैने तो कुछ कहा ही नहीं ।
वाह !चित भी मेरी और पट्ट भी ।

बुधवार, 23 जून 2010

उदासीनता की पराकाष्ठा

*
अपने देवताओं के प्रति हमारी आस्थाएँ कितनी दृढ़ हैं कितना श्रद्धा-भाव है !
विवाहादि मंगल-कार्यों में निमंत्रण-पत्रों पर विघ्नहर्ता गणपति की हल्दी-कुंकुंम से सज्जित आकृति चिपका कर और कार्य पूर्ण होने की प्रार्थना के साथ रीति निभा दी .और काम पूरा होते ही ,गया सब कचरे में .
निमंत्रण पत्र तो खास समय की बात है ,हर साल कैलेन्डरों में भगवान का कोई रूप मनोहर रंग-रूप दे छपवाते हैं . टँगा रहते हैं साल भर दीवार पर और फिर पुराना होते ही उतार कर फेंक दिया- साल दर साल यही .बीड़ी का बंडल ,पान-मसाला ,दियासलाई ,जरूरत-बेज़रूरत की सारी चीज़ों पर उनके रूप और नाम आँक दिये .उन के नाम से बेचने में दोहरा फ़ायदा ! और बाद में सब की सब बेकार की चीज़ हो कर रह जाती है - नालियों में ,कूड़े के ढेरं पर गंदगी में और पाँवों के नीचे जूते-चप्पलों से कुचली जाती हुई !
और तो और गले में टाँग लेते है पेन्डेन्ट में ढाल कर ! क्या करें बेचारे . भगवान हैं न ,श्रद्धा और प्रेम के भूखे - पसीने से नहाते के शरीर-गंध झेलते ,पाउडर चाटते लटकते झूलते-डोलते रहते हैं.

और भी - गलियों में ,सड़कों के किनारे ,के किसी चबूतरे या आले में स्थापित देव- प्रतिमाएँ !
भक्त आए पूज कर प्रार्थना कर गए !प्रसाद धर गए, दूध चढ़ा गए -जो बह-बह कर नालियों में जा रहा है और कुत्ते चाट रहे हैं .कुछ लोग कुछ सिक्के भी चढ़ा जाते है ,जिन्हें सड़क चलते लड़के उठा कर अपने व्यसन पूरे करते हैं.
देखते सब हैं पर क्या फ़र्क पड़ता है किसी को ?जब तक काम तब तक मान !
भक्ति(स्वार्थ-प्रेरित) के आवेग का उतार, श्रद्धा का नकारापन ,पूज्यभाव की प्रतिक्रिया क्या कहें इसे ?
या फिर उदासीनता की पराकाष्ठा !

बुधवार, 16 जून 2010

नए लोक-शब्द

*
अभी से सुनना-समझना शुरू कर दीजिए. नहीं तो पिछड़ जाएंगे .कुछ दिनों में ये शब्द साहित्यिक प्रयोगों में आने लगेंगे .क्योंकि पुराने तो विस्थापित होते जा रहे हैं ,लोगों को दुरूह लगने लगे हैं ,उनकी अर्थवत्तापर संकट आता जा रहा है ,और ये नये टटके शब्द जनभाषा के हैं ,साहित्य को जनभाषा में ला कर उसे जनता के लिए अति बोध-गम्य बनाने का प्रगतिशील विचार इन्हींको सिर-आँखों धरेगा .
इनका आाविष्कार हमारी कामवालियों ने किया है .घर में झाड़ू-पोंछा ,चौका बर्तन ,कपड़े धोना आदि काम ही नहीं सब देखती -समझती हैं .उनकी निरीक्षण क्षमता गज़ब की है और टीवी की कृपा से उनका मानसिक स्तर और विकसित होता जा रहा है ,रहन-सहन बोल-चाल सब पर दूरगामी प्रभाव !
आपने 'फर्बट' शब्द सुना है ?
हमन तो इनके मुख से बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं .
अपनी कोई साथिन जब उन्हें अपने से अधिक चाक-चौबस्त लगती है तो चट् मनोभाव प्रकट करती हैं ,-'अरे, उसकी मत पूछो ,क्या फर्वट है !'
इस युवापीढ़ी का अर्थ-बोध और मौलिक उद्भावनाएं गज़ब की हैं
फर्वट - इसका मतलब है फ़ारवर्ड !
और फिरंट का मतलब जानते हैं ?
जो अपने से आगे बढ़ी हुई लगे उसे कहेंगी 'फिरंट'(फ़्रंट से बना है)-इसमें थोड़ा तेज़-तर्राक होना भी शामिल है.
'टैम' ने समय को विस्थापित कर दिया है ।और माचिस ! दियासलाई हैं भी कोई अब ?
सलूका ,अँगिया आदि वस्त्र ग़ायब हो गये उनका स्थान ले लिया है ,ब्लाउज ,आदि ने।
हमारे एक परिचित हैं अच्छे पढ़े-लिखे उनका कहना है स्टोर्स में लेडीजों का माल भरा पड़ा है. एक दिन बोले हमारा पप्पू शूज़ों का बिज़नेस करेगा .
शूज़ों का बिज़नेस - यह भी सही है! शू का मतलब तो एक पाँव का एक जूता जब कि जूते हमेश दो होते है- शूज़ :और उसका बहुबचन शूज़ों ठीक तो है .
अब कोई प्याली में चाय तक नहीं पीता ,कप में पीते हैं ।
थालियों में कौन खाता हैं सब पलेट में खायेगे ,चाहे फ़ूलप्लेट हो या छोटी पलेट .
और हिन्दी भी बदल रही है अब तो
देखिए न अच्छे-पढ़े लिखे लोग सफ़ल लिखते हैं ? सफल लिख-बोल कर अपनी हेठी क्यों करें ?
अब मालिनें भी फूल नहीं 'फ़ूल' बेचती हैं -फ बोलने से जीभ में झटका लगता है फल नहीं फ़ल खाना सभ्यता का लक्षण है.
अंग्रेज़ी भाषा की तो बात ही मत पूछो ।अनपढ़ लोग, गाँव के वासी यहाँ तक कि महरी ,जमादारिन मालिन सबके सिर चढ़ कर बोल रही है ।
जो जनता बोले वही असली भाषा - आगे तो वही चलबे करेगी !
*

शनिवार, 12 जून 2010

सब ऐसे ही करते हैं ।

*
कानपुर शहर .चुन्नीगंज से फूलबाग़ जाना था -लंबा रास्ता .
टेम्पोवाला चल्ला-चिल्ला कर आवाज़ लगा रहा है
बैठ गई मैं भी .ज़रा देर में भर गया .चार सवारियाँ इधर ,चार उधर ,दो आगे ड्राइवर की साइड में -ठूँस-ठाँस कर सब को भर दिया उसने.
चलो थोड़ी देर की बात है!
टेम्पोवाले ने स्टार्ट किया और रिकार्ड ऑन कर दिया .फ़ुल वाल्यूम !
  कान झनझना गए .साथ में जो महिला बैठी थीं स्कूल जा रही थीं ।उन्होने कान पर हाथ रख लिये .
सब चुप हैं कोई नहीं बोल रहा .एक तो खड़खड़ाता पुराना टेम्पो ,ऊपर से कानपुर की सड़कें .नगर-निगम की मनमानी की मारी ,चार दिन सुधरती तो आठ दिन टूट-बिखरतीं .केबिलवाले ,जल-मल वाले ,शादी ब्याह वगैरा के तंबू-शंबूवाले सब की मन-चाही तोड़फोड़ झेलतीं , उछाल-उछाल कर आकाश-पाताल की सैर करातीं अपने और साथ में  सवारी के कल-पुर्ज़े भी डुलाते-बजाते  हमेशा से ऐसी ही रही हैं क्या ?.ऊपर से चीख़ती हुई गाने की आवाज और रास्ते के हाहकारी  चीख़-पुकार तो हैं ही ..
थोड़ी देर इंतज़ार किया कि शायद कोई कहे, फिर मैंने कहा ,'इससे कहें या तो वाल्यूम कम करे नहीं तो बंद कर दे ।'
वे बोलीं ,'कोई फ़ायदा नहीं , वह नहीं सुनेगा.ये.सब ऐसे ई करते हैं .हमी क्यों बोलें?'
सवारियाँ चिल्ला-चिल्ला कर बातें कर रही हैं .
'परेशानी तो सभी को हो रही है .चलो हमीं कहते है . '
' ना,ना .बिलकुल नहीं .कोई हमारी तरफ से नहीं बोलेगा, बल्कि सब मज़ा लेंगे कि बड़ा बनती हैं अपने आप को !'
'आप तो रोज़ ऐसे ही जाती होंगी ?सिर भन्ना जाता होगा ?'
'क्या करें ? जाना पड़ता है .हमारे यहाँ की आधी टीचर्स दूर से आती हैं.सब ऐसे ही शोर सुनती हुई आती हैं .कभी कभी तो ये लोग दूसरे के हार्न की आवाज़ भी नहीं सुनते । कल ही एक्सीडेंट होते होते बचा .'
'फिर भी कोई मना नहीं करता ?'
'कोई कहे तो बंद तो होता नहीं ऊपर से और मज़ाक बन जाता है .इसलिए
सब चुप रह जाते हैं , ज़रा देर की  बात है ।कान पड़ी बात भी सुनाई नहीं देती क्या करें ?मजबूरी है .'
हाँ, जब सब यही करते हैं तो अच्छा हो या बुरा .सही हो या गलत. वही करना है ।वही होता रहेगा सदा सदा को .
पीछे- पीछे खुसुर-पुसुर होती है ,आपस में दूसरों की शिकायतें करते हैं,पर सामने कोई नहीं कुछ कहता ।सब को परेशानी है ।लेकिन हम क्या करें ,सब ऐसे ही करते हैं ।
उथल-पुथल मचती रही मन में .मैं कहूँ और वह टका सा जवाब दे दे तो ?कोई बोलेगा नहीं .मेरे ऊपर तरस खाते सब सहनशील, भले  बने बैठे रहेंगे .
रहा नहीं जा रहा .देखी जायगी जो होयगा !
ड्राइवर मेरे पीछे था .मैं ज़रा मुड़ी ,'भइया ,ज़रा ये गाने का वाल्यूम थोड़ा कर कर देंगे ?'
उसने घूम कर देखा .सब मुझे ही देख रहे हैं .मैं सहज उसकी ओर देख रही हूँ.
'हाँ ,हाँ ,लीजिए!. चलो बंद ही कर देते हैं थोड़ी देर को .कुछ खराबी आ गई सो धीमा नहीं होता न! '
हे भगवान ,चैन की साँस ली मैंने !
सब ऐसे ही क्यों करते है ?
*

बुधवार, 9 जून 2010

कौल-फ़ेल का इत्मीनान

*
पत्रकारिता का कोर्स किया था तो पढ़ा था -कुत्ता आदमी के काटे तो खबर नहीं बनती ,हाँ आदमी अगर कुत्ते के काट खाये तो फ़ौरन खबर बन जाती है ।तब बड़ी हँसी आई थी ,पर सत्य फिक्शन से अधिक विचित्र होता है (यही कारण है कि लोग सच पर विश्वास नहीं कर पाते और झूठ पर आसानी से कर लेते हैं ।)
एक समाचार पढ़ा था - अमेरिका के विक्टोरया में आदमी ने कुत्ते के काट खाया ।
हुआ यह कि पुलिस ने अपने रुटीन वेहिकल चेकिंग करते समय उसे रुकने का इशारा किया ।वह नहीं रुका। चलता चला गया लगा । पुलिस ने पीछा किया तो उसने भागने की कोशिश की ।पेगो ,पुलिस ने 3 वर्ष का जर्मन शेपर्ड कुत्ता पीछे लगा दिया ।
आदमी के पीछे कुत्ता लगाया ये कहाँ की इन्सानियत हुई । उसने बचने की पूरी कोशिश की ।कुत्ते के सिर पर वार किया ,उसका गला दबाया और अपने दाँतों से कुत्ते को काट खाया ,आफिसर माइकल आडे आ गया तो उससे भी लोहा लिया उसके भी चोटें आईं ।आदमी का नाम सार्वजनिक नहीं किया गया क्यों बेचारे आदमी को शर्मिन्दा करें ।
अब पुलिस की मानवीयता देखिये ।उसे खतरनाक ड्राइविंग ,मादक पदार्थ रखने और ड्यूटी पर पुलिस आफिसर से मारपीट करने का अपराधी करार दिया ।कुत्ता भी ड्यूटी पर था ।पर उसे चोट पहुँचाने के लिये मुकद्दमा नहीं चलायेंगे ।कारण -कानूनन कुत्ता शपथ ग्रहीत पुलिस आफ़सर नहीं है ।अब यह बात अलग है पुलिस डाग हैंडलर्स संघ कानून को ही बदल डालना चाहता है उन्हें अपने कुत्ते अधिक महत्वपूर्ण लगते हैं ।उच्च प्रशिक्षण प्राप्त हैं और पुलिस विभाग के बहुत मूल्यवान सदस्य हैं ।कुत्ता प्रशिक्षित है आदमी कुशिक्षित ।
असलियत यह है कि आदमी अपना काम कर रहा है, कुत्ता अपना ।आदमी की जात कभी समान नहीं सोचती ,न इनका व्यवहार एकसा होता है ।एक से एक निराले ।देखिये कुछ चोर हैं कुछ चौकीदार ।जानवर फिर भी एक सा सोचते एक सा करते हैं ।आदमी कब क्या करेगा कुछ ठिकाना नहीं । उसके कौल-फ़ेल का कोई इत्मीनान नहीं ।जानवरों को सिखा-पढ़ाकर आदमी के उपयुक्त बनाया जा सकता है ,पर पढ़ा-लिखा कर आदमी को जानवर के अनुसार नहीं ढाल सकते । प्रशिक्षित कुत्ता आदमी से ज्यादा कुशल हो जाता है -कई कामों में ,जब कि पढ़-लिख कर आदमी न इधर का रहता है न उधर का ।
और देखिये न कुत्ते का महत्व तो प्राचीन काल से रहा है । युठिष्ठिर के साथ एक कुत्ता स्वर्ग जा सका ,न बाकी के पाण्डव ,न द्रौपदी ।
*

सोचिये मत.

*
जब पढती थी तब पढ़ाया गया था 'अपारे काव्य संसारे कविरैव प्रजापतिः .
अक्सर यह होता है ,छात्र-जीवन में जो पढ़ाया जाता है ,उसे हम पढ़ लेते हैं ।उसमें कितना सच है उस समय समझ में नहीं आता .पर विज्ञों द्वारा एक बात कही गई है -सोच कर चुप हो जाते हैं ,कि उसके पीछे गहरे अनुभवों की लंबी परंपरा होगी ।सब का मैं नहीं कह सकती क्योंकि कुछ अति तीव्र-बुद्धि लोग उसका सच तुरंत आत्मसात् कर लेते होंगे , पर तब मेरे गले से पूरा नहीं उतर पाता था ।
लेकिन अब मैं अपने चारों ओर वही सब घटता देख कर समझ गई हूँ ।
हाँ तो बात थी ,कवि निरंकुश होता है ।कवि से उनका मतलब रचनाकार से होता था ,अर्थात् लेखक !इधर कहानियों ,उपन्यासों के लेखक ... फिर सिनेमा की कहानियाँ और एक से एक टीवी सीरियल!।जो वहाँ देखा ,जीवन में कहीं होता नज़र नहीं आया ।घर में किसी लड़की को पेड़ की डाल के सहारे विरह के गीत गाते मैं न पा सकी कॉलेज का ऐसा रंगीन वातारण छात्र-छात्राओं का निरंकुश व्यवहार , कहीं डिसिप्लिन नहीं ,गाँवों की वेष-भूषा और जवान लड़कियों का खेतों में नाचना गाना । प्रेम-गीतों के दृष्यीकरण में खूब हरे-भरे पार्क में ,दोनों का प्रेमालाप एक ही दृष्य में , कपड़े बदल-बदल कर एक दूसरे के पीछे दौड़ना ,नाचना ,लिपटना-चिपटना ,और उस समय वहाँ कोई आता नहीं ,जब कि हिन्दुस्तान में ऐसा हो तो लोगों की भीड़ इकट्ठी हो जाय .पर लेखक यदि चाहे तो क्या नहीं कर सकता ?जो कहीं न दिखाई दे वह देख लीजिये हिन्दी के सीरियल्स और मूवीज में. एक से एक चमत्कार चमत्कार !एक से एक नई उद्भावनायें -संभव-असंभव सब ।
सोचिये मत नहीं तो सिर घूम जायेगा ,सिर्फ़ आँखें फाड़ कर देखिये और दाद दीजिये रचनाकार की पहुँच की !
*

नहीं, नहीं, नहीं !

हेमा -
वह मेरी छात्रा रही थी आज से आठ वर्ष पहले - खूब लंबी-सी ,साँवली-सलोनी हेमा .
उसे देख कर मुझे लगता मैं पढ़ा रही हूँ ,और यह अपने् में मगन ,जैसे मन ही मन हँसे जा रही हो .
'क्यों ,क्या बात है हेमा ?'
'कुछ नहीं दीदी,' खड़े हो कर वह बोलती .
एक बार तो बेंच पर खड़ा कर दिया था इसीलिए. पढ़ने में साधारण थी .और कोई बुराई नहीं थी बस डाँटो तो भी लगता था हँस रही है .
फिर सुना हेमा की शादी हो गई.
 ससुरालवाले पढ़ाना नहीं चाहते.लड़कियों के साथ अक्सर ही ऐसा होता है

 किसी ने बताया था एक बच्चे की मां बन गई कच्ची-सी हेमा.

स्कूल में दिखी थी एक बार .पीली-सी ,दुबली-सी .पर चेहरे पर वही हँसी थी.

मेरे सामने आते शर्मा रही थी .मैंने ही आवाज़ दे कर बुलाया था .

'हेमा,ससुराल में भी ऐसे ही हँसती हो न .'

'नहीं दीदी ,हर समय दाँत खोले रखना किसी को अच्छा नहीं लगता .

मैं धक् से रह गई थी.

हँसने पर सबसे पहले मैंने ही टोका था उसे .
हमारे यहाँ एक शिक्षिका की नियुक्ति हुई ,हेमा उनकी संबंधी थी .
समाचार मिलते रहे.
आदमी ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी .पिता की दुकान पर बैठने लगा .फिर यार-दोस्तो में रमने की आदत पड़ गई.

घर में हेमा की कदर घट गई थी , ऊपर से दो बच्चे .

वह कुछ कहती तो चिल्लाता ,'तुझसे क्या मतलब सुसरी ,खाने-पहनने के लिए मिलता है और क्या चाहिए .हमारे ऊपर सासन करना चाहे तो जूता लगा देंगे .'

एक विधवा जिठानी हमेशा सिर पर सवार रहती थी .
आदमी की आदतें  बिगड़ी हुई थीं.
 एक बार एक काली-सी औरत को घर भी ले आया था .पड़ोसियों से पता लगा था.बहुत दिनों से उससे संबंध था ,

बच्चों के लिए वह जुम्मेदार थी .जिसके अत्यचार सहकर उसने बच्चों को धारण किया ,क्या उसके मन ने उसे कभी सहजरूप में स्वीकारा होगा !और जब तक वह जी अपने बच्चों को सामने-सामने दुरदुराया जाता देख उसे कैसा लगता होगा - मैं सोच कर विचलित हो जाती .
पर सबकी निगाहों में हेमा दोषी है ,जिस आदमी ने कभी उसके साथ न्याय नहीं किया वह निर्दोष !

एक बार वह मायके भाग आई थी बिना किसी को बताए .

घर पर माँ-बाप ने मुश्किल कर दी .

मैने कहा था ,'मत भेजो इसे वहां .पढ़ने का खर्च मैं दूंगी .पढ़ा कर नौकरी करा दो ।'

हेमा ने मेरे पांव पकड़ लिए थे .'दीदी,मुझे वहां मत भेजो .'
उसकी माँ आड़े आ गईँ -
'आप समझती क्यों नहीं ?हमें और भी लड़कियां ब्याहनी हैं .'

फिर इसका आदमी छोड़ेगा इसे .जरा में कह दिया ये बच्चे ही मेरे नहीं हैं तो हम क्या कर लेंगे उसका ?इतना कलंक लेकर कहां जी पाएगी यह !'

माँ रो रही थी .इससे अच्छा था मर जाती झंझट खत्म होता .
फिर सुना वह अपने रिश्तेदारों के साथ आय़ा था औऱ सड़क पर घसीटा था हेमा को .

उसके बाप को धमका गया तुम कुछ भी बोले तो हवालात में बंद करवा दूंगा .

फिर चार बरस हेमा मायके नहीं आई.

जिसे हँसने पर डांटती थी वह हेमा कितने साल बिलकुल नही हँसी होगी !

अब वह कभी नहीं हँसेगी . इस हँसी और रुदन से मुक्त हो गई वह .

मेरी आँखें क्यों भरी आ रही हैं ?मेरा उसका कोई संबंध नहीं था .कुछ साल मेरे क्लास में रही थी ह अपने हँसते चेहरे पर डाँट खाती .

बार-बार आंसू उमड़े आ रहे हैं .

मैं समझ रही हूं ,उन स्थितियों में जीना ,किसी के लिए संभव नहीं .

जो विद्रोह करता है वह जी लेता है ,जो नहीं कर पाता वह मरने पहले भी बार-बार मरता है .

जीवन भर कुढ़-कुढ़ कर रहने से अच्छा एक बार मर जाना या डट कर लड़ना .प्रकृति में सदा से यह होता आया है ,जो समर्थ है जीता है ,असमर्थ मिट जाता है ,चाहे वह स्वयं को मिटाले या दूसरे उसे मिटा दें .

क्वाँरी लड़की से माँ कहती है ,अपने घर जाकर अपना मन पूरा करना .पर अपना घर मिलता है क्या ?,कहीं कोई अधिकार होता है क्या ?

साथ की एक शिक्षिका ने कहा था 'सुसाइड करना कायरता है .'

इन्सान पागल हो जाए उससे अच्छा उस अभिशापमय जीवन से मुक्त हो जाना नहीं है क्या ?'

एक और अधपका व्यक्तित्व निर्ममता से तोड़ डाला गया .


उसे शुरू से ढाला गया था -सीधी बनो ,सुशील बनो ,सब कुछ सह लो ,किसी को जवाब मत दो .लड़की का धर्म है सब के अनुसार चलना .

हेमा के साथ जो हुआ,उसमें  कुसूर किसका ?
शुरू से कह- कह कर कि अपना मत सोचो ,अपनी इच्छा कुछ नहीं, दबा दिया था उसका मन .
पिर भी दोष उसका है ?

जिनने उसे मरने के लिए विवश किया वे निर्दोष हैं ?

वह बीमार नहीं थी ,उसका दिमाग़ खराब नहीं था .-हां बाद के दिनों में बड़ी हताश और थकी-हारी लगती थी .

वह कर्कशा नहीं थी ,होती तो दूसरों का जीना दूभर कर देती .,मां-बाप ने इतना निरीह बना कर इस क्रूर दुनियां के अयोग्य बना दिया था.
सबसे बड़ी जुम्मेदारी उस आदमी की जो माँ-बाप के पास से ले गय़ा था ,जिसमें अपनी कोई की सामर्थ्य नहीं थी ,बस अपने को उस पर थोपता चला गया .
वह उसे छोड़ गई क्या बुरा किया ?
यंत्रणा कितनी वीभत्स होती है .
सारी दुनिया को बहका सकती हूँ ,धोखा दे सकती हूँ अपने को भी, पर कलम से नहीं .उससे भेद नहीं चल पाता .
हाथ में कलम लेकर निर्भय हो जाती हूं सब-कुछ कहने के लिए .
एक दुर्निवार आकर्षण है जो मेरा मन इसे सौंप देता है ,अपने असली रूप में .

हथ में कलम लेकर कुछ सोचती नहीं बस लिखती हूं .वह चलती जाती है मैं चुप .

उसके जीवन पर पति का अधिकार रहा , उसका नहीं .सहते-सहते सीमा पार हो गई होगी मन ने विद्रोह किया होगा , तब उसे बता दिया गया होगा कि मुझसे बच कर जी नही सकतीं .

वह चली गई है ,चार दिन में सब ठीक हो जाएगा .रो-धो कर सब शान्त हो जाएँगे

आदमी दूसरा ब्याह कर लेगा ,बच्च रो-झींक कर चुप हो जाएँगे .

पर अपना ध्यान बार-बार उधर जाने से रोक नहीं पाती .

बात चाहे किसी की हो मेरा मन मुझे कटघरे में खड़ा कर बहस करने लगता है .

दारुण से दारुण वेदना सह कर भी आदमी थोड़ा और जी लेना चाहता है .

 अपने-आप को कोई मार लेता है -क्या आवेश में?

नहीं ऐसी लड़की आवेश में अपने को नहीं मार सकती .

इसके पीछे बड़ी लंबी विचारणा रही होगी ..पहले तो अपने न रहने की कल्पना कर वह रोई होगी .

अपने बच्चों का सोच-सोच कर व्याकुल हुई होगी .उनकी निरीह दशा पर कितनी अशान्ति झेली होगी उसने.

और रास्ते भी ढूँढे होंगे .

जब सब कुछ असहनीय हो उठा होगा ,कुछ न कर पाई होगी ,तब हार कर उसने यह आखिरी कदम उठाया होगा .

मन की पीर हो या तन की सहने की एक सीमा है .
ऐसे निर्णायक क्षण ,पुरुष के जीवन में आयें तो वह बौखला जाता है .क्रोध में या उन्मत्त हो ,चीख-पुकार मचाता है .अपना ग़ुबार निकाल लेता है .और हेमा ....कोई रास्ता नहीं उसके पास !

 सोच रही हूँ जीवन का अंत दुखमय क्यों  होता है -भीषण हा-हाकार ,रुदन से भऱपूर !कैसा जीवन है -प्रारंभ और अंत दोनों दुखमय और इसके बीच में क्या मिलता है -सुख,आनन्द ,संतोष ?
नहीं , कुछ नहीं,कुछ भी नहीं !
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*

बुधवार, 12 मई 2010

विधवा

सुना-गुना -
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विधवा - काली का एक नाम विधवा भी है ..
एक समय बहुत क्रोध में वे संहार कर रहीं थीं. देवगण घबरा गए .अनेक उपाय किए पर उनका क्रोध शान्त नहीं हुआ .अंत में सहकाल शिव से विनती की गई कि वे अपनी पत्नी का वेग रोकें .
शिव सामने आए पर क्रोध में महाकाली उन्हें भी चबा गईँ.विश्व में हाहाकार मच गया .देवता और सप्तर्षि एक साथ मिल कर अनुनय-विनय करते सामने लेट गए .तब भगवती को ध्यान आया कि वे क्या कर बैठीं.उन्होंने तत्काल शिव को मुँह से उगल दिया .तभी से उनका एक नाम विधवा हो गयी .यह नाम बड़ा शुभ शब्द माना जाता है.
प्रतीक रूप में इस कथा का अर्थ है मृत्यु को भी खा जानेवाली .महाकाल की धरातल पर लेटी हुई शक्ति पर महशक्ति खड़ी है .महाकाल की छाती पर जीभ फैलाए कह रही है -आओ अपने संस्कार हमें अर्पित करो ,मैं उन्हें खा जाऊँगी .,तुम्हें मोक्ष दूँगी .
तुम्हें महाकाल से क्या डर!वह तो मेरे पैरों के नीचे पड़ा है .मैं तुम्हें अमर कर दूँगी .पहले अपने पाप-ताप-लोभ मेरे हवाले करो
उनके बाएँ हाथ में नर-मुण्ड है और रक्त भूमि पर नहीं खप्पर में गिर रहा है .
वे उसे पान कर लेंगी .दाहिना एक हाथ ऊपर उठा अभय-दान कर रहा है .
पर नीचे का खुला है कह रहा है -मेरी शरण में आओ,नीचे पड़े हुए महाकाल को देखो -मैं जनम और मृत्यु से छुटकारा दे रही हूं .
(कन्नड़ के कवि मधुन्ना ने अपने ग्रंथ-अद्भुतरामायण में युद्ध के प्रसंग में महाकाली के द्वारा ही रावण का विनाश करवाया है .धरती माता के कण-कण से तेज काली के रूप में प्रत्यक्ष हो कर रावण के विनाश का कारण बना.)
'जो भ्रान्ति और बुद्धि,तृष्णा और तुष्टि ,निद्रा और चैतन्य जैसे विरोधी ध्रुवोंकी अद्वैत इकाई व्यक्त हुई उस माँ से भी बड़ी कोई ईश्वरी. विभूति नहीं हो सकती .
जो माँ है ,चाहे वह जगदम्बा ,हो जननी हो ,जन्मभूमिहो या जन्म देनवाली हमारी माँ हो उसी केके ये विपरीत ध्रुव पिघल कर हमारा कल्याण करते हैं .
*

शिव क्यों नाचते हैं ?

(सुना-गुना)
शिव क्यों नाचते हैं ?
जिसमें जीवन और मृत्यु का संतुलन बना रहे .
नृत्य रुका सृष्टि समाप्त.वह सिर्फ़ प्रलय-नृत्य नहीं है ,जो तभी होता है जब उन्हें क्रोध आता है .उन्हें अकारण क्रोध नहीं आता ,अक्षम्य होने पर ही आता है .और फिर विनाश का ताँडव-भूकंप,बाढ़.युद्ध.महामारी .
उनके डमरु-नाद से जीव के अंदर आत्मा प्रवेश करती है ,चरणों की थाप से धरती अन्न-मूल-फल उगाती है.वे ही हैं नृत्य-कला के प्रारंभ कर्ता.वैद्य परंपरा के प्रथम आचार्य-महाभिषग.
वे वनों में मात्र साधना नहीं करते नृत्य और गायन के प्रथम आचार्य हैं.नृत्य-शास्त्र का जन्म उन्हीं के पैरों की थाप और होथों की मुद्राओं से हुआ.उनका नृत्य विनाशकारी नहीं सृजन का है.
वे परम योगी हैं-पर घर -गृहस्थी के बीच रह कर,पत्नी-पुत्रों के साथ उन्हें भरपूर प्यार देते हुए .भोग और योग का अद्भुत संगम है.
दिगंबर हैं शिव.सृष्टि को स्थिरता देने वाली शक्ति हैं दिक्-वही उनका वस्त्र है .जीवन-दायिनी गंगा को शिर पर धरते हैं ,फिर भी वे संपूर्ण मानव हैं -काशी ,उज्जयिनी,हरद्वार जैसी नगरियाँ उन्हीं की बसाई हुई है .मस्तमौला हैं .डट कर मद्य-सेवन करते हैं.ज्ञानी इतने कि तंत्र-विद्या के जनक भी वही हैं.(श्यामा तंत्र पहला तंत्र है जो शिव ने रचा.)विष को भी पी जाने वाले .
बैल -कृषि-प्रधान सभ्यता का प्रतीक है ,इसीलिए जीवन के बहुत समीप हैं .हमारे हितैषी हैं.धरती केा सर्वनाश करने पर तुली महाकाली के चरणों में लेट कर उन्हें शान्त कर देते हैं .
वे पशुपतिनाथ हैं.-वनों और वनचरों की हत्या के नितान्त विरुद्ध .
सारे आगम उन्हीं ने रचे हैं इसीलिए वे महेश्वर कहलाए .वे सृष्टि की स्थिति के देव हैं
जगत का आदि कारण ही शिव की इच्छा और क्रिया ही उनका निरंतर नृत्य है ,जिसके लय-ताल-थाप से धरती में जीवन का संचार होता है ..

मंगलवार, 11 मई 2010

सफ़ाई

*
मेरी नातिन बड़ी सफ़ाई पसन्द है ।
एक बार की बात है मेरा कंघा नहीं मिल रहा था ।वह बोली ,'नानी मेरा ले लीजिये ।'
'ढूँढ रही हूँ अभी मिल जायेगा ,जायेगा कहाँ !'
' मुझे पता है आप किसी के कंघे से बाल नहीं काढतीं ।मेरा बिल्कुल साफ़ रखा है ।आपने उस दिन ब्रश से साफ़ किया था ,तब से वैसा ही रखा है ।'
'क्यों तुम उससे बाल नहीं काढ़तीं ?'
'मैं तो मम्मी के से काढ़ लेती हूँ , मेरा कंघा हमेशा बिल्कुल साफ़ रखा रहता है ।'
इसे कहते हैं सफ़ाई !
*

एक बात बताऊँ

'मम्मी एक बात बताऊँ?'
हाँ, हाँ ,बताओ ।'
'किसी से कहेंगी तो नहीं ?'
मम्मी ने कौतुक से देखा -इतना छोटा लड़का कौन सी प्राइवेट बात कर रहा है जो किसी से कहने की नहीं !
'नहीं !'
'वो जो लल्लू है न ,उसके पापा दरवाज़ा बंद कर के घर में झाड़ू लगाते हैं ,'जैसे किसी की पोल खोल रहा हो ऐसे स्वरों में बोला ।
'अच्छा !', उन्होंने आश्चर्य व्यक्त किया ।
'हाँ ,और जब उसकी मम्मी-पापा में झगड़ा हो जाता है तो रोटी भी बनाते हैं ।'
'अरे ,तुम्हें कैसे मालूम ?'
'उसी ने बताया .लल्लू ने ।और कहा तुम किसी से कहना मत ।मम्मी तुम, किसी से मत कहना ।'
'नहीं मैं क्यों कहूँगी किसीसे ।'
'और बतायें ?'
'हाँ,हाँ ।'
'वो लोग अपने घर में अंडा और मीट भी खाते हैं ।'
'तो क्या हुआ ?हमारे घर में भी तो बनता है ।'
'नहीं वो लोग ,चुपके से खाते हैं ,किसी को बताते नहीं ।हम आमलेट ले गये थे तो लल्लू ने माँगी और कहा किसी से कहना मत ।'
'अच्छा !'
मम्मी,तुम किसी से कह मत देना ,उसने बिल्कुल मना कया है ।'
'नहीं ,बिल्कुल नहीं ।मैं क्यों कहूँगी ?'
अपना रहस्य मुझे सौंप कर वह निश्चिंत सो गया है ।
*

माताजी से मत कहना


*
इन्टर कॉलेज में पढ़ा रही थी उन दिनों .
हम छः-सात बराबर की टीचर्स थीं बस,दो-तीन साल की छुटाई-बड़ाई रही होगी .यही बीस-बाईस की उम्र .
सब प्रिन्सिपल से खीझी रहतीं थीं -अच्छी पटरी बैठती थी हमलोगों में .शादी हममें से दो की ही हुई थी एक रमा जी को छोड़ कर बाकी सब उम्मीदवारी में थीं .
रमा जी रमा जी जी - ज़रा मोटी और देखने में साधारण , अट्ठाइस पार कर गईं थीं ,तीन छोटी बहिने पढ रहीं थीं .कहतीं थीं मुझे शादी नहीं करनी ,इन लोगों की करवानी है .सादे जीवन में विश्वास करनेवालीबहुत आदर्शवादी महिला थीं .
हमलोगों मे किसी की ज़रा जबियत खराब हो जाये तो लेक्चर झाड़ने लगतीं थीं -'अरे सबसे बड़ी चीज़ है संयम .इन्सान संयम से रहे तो हमेशा स्वस्थ रहे .और हम दोनो विवाहिताओं के सामने ब्रह्मचर्य का महत्व बखानते थकती नहीं थीं .ब्रह्मचारी रहो तो शरीर में शक्ति बनी रहती है .जरा सी मेहनत पड़े तो ये नहीं कि थके जा रहे हैं . चेहरे पर तेज रहता है और मन हमेशा प्रसन्न .दवा की कभी जरूरत ही न पडे और भी जाने क्या - क्या .
हम दोनो को को उनकी लेक्चरबाज़ी सुहाती नहीं थी .पर क्या करते एक तो उम्र में बड़ी ,फिर उनकी बातें नाना पुराण -निगमागम सम्मत .विरोध कर नहीं सकते .खिसयाहट तो लगती ही जैसे हम पापी ,अनाचारी हों .फिर हम भी बोलने लगे .
जरा उनकी तबियत नासाज़ होती , हम फौरन घेर लेते ,'रमा जी ,क्या हो गया ?आप तो बाल-ब्रह्मचारी हैं फिर कैसे ढीली पड़ गईं .शारीरिक ब्रह्मचर्य का महत्व है पर मानसिक उससे भी ज्यादा असर डालता है .आजकल क्या मन में कुछ ऐसा-वैसा ,सोचती रहती हैं ?
दूसरी कहती , 'हाँ मन को जीते बिना सब बेकार .हम लोगों की संगत का आप पर कोई खराब असर तो नहीं पड़ने लगा ?'
वे बेचारी दोनों ओर से घिर जातीं ,साथ की टीचर्स मज़े लेती हँसती रहतीं
'आप सावधान रहिये , मन को कस के नियंत्रण में रखे रहिये .'
कभी उनसे समाधान मांगते 'पता नहीं ,सिर में दर्द क्यों होने लगा !हम तो एक हफ़्ते से ब्रह्मचारी हैं .'
'पति टूर पर गये लगते हैं ' दूसरी और जोड़ देरी ,' और चार दिन से तो हम भी ...'
बाकी साथिने हँसी रोकतीं -और रमा जी आँखें तरेरतीं .हम बेशर्मों पर कोई असर न होते देख लाचार झेंपी हुई सी मुस्करा कर अपनी खिसियाहट छिपा लेतीं .
इधर कुछ दनों से परेशान थीं .
'क्या हो गया आजकल आप चिन्तित लगती हैं .''
'इधर कुछ दिनों से अम्माँ की तबीयत खराब चल रही है .'
' अरे ,अम्माँ तो बहुत एक्टिव थीं ..क्या हुआ है ?'
'बताती तो हैं नहीं .कुछ दिनों से सिर में दर्द रहता था अब बहुत बढ़ गया .टेस्ट कराये हैं .'
हम लोगों को सुनकर दुख हुआ पर ललिता चुप न रह सकी उसने जड़ दिया , ' रमा जी, आप तो आदर्शवादी हैं .बेलाग बात कहने की हिम्मत है आपमें . पर हमलोगों से आप चाहे जो कुछ कह लीजिये ,माताजी से ये सब मत कहियेगा .'
घड़ों पानी पड़ गया हो जैसे उन पर रमा जी एकदम चुप ! धीरे से वहाँ से खिसक लीं .'
अब सोचती हूँ ,हमें उन्हें से ऐसी बेतुकी बातें नहीं करनी चाहिये थीं .उनकी अपनी मजबूरियाँ थीं ,
चार छोटी बहनें ब्याहने को ,पिता रिटायर हो चुके थे .पर तब इतना सब सोचने की ताब कहाँ थी अब सोचती हूँ तो लगता है- घर-बाहर के साथ वृद्ध होते माता-पिता और अन-ब्याही बहिनों की जुम्मेदारी उठाती रमा जी पर कितना बोझ पड़ता होगा. आदर्शवाद के आवरण में अपने को बहलाये रखना और ऊपर से हमलोगों की बातें सुनना उन पर क्या बीतती होगी.
*



एक नमूना

*
' क्यों डॉ.राय ,' मंजु ने आवाज़ दी ,'पिछली बार तो आपने लड़कों को वाक-आउट करा दिया था कि पेपर आउट ऑफ़ कोर्स जा रहा है ,एकदम बेतुका... !
डॉ राय चलते से रुक कर खड़े हो गये हम काहे को कराते लड़कों ने कहा तो हमने भी अपनी राय दे दी ।'
' इस साल तो आपके छात्र परम संतुष्ट होंगे ,आपका सेट किया हुआ पेपर जो था ।'
'डॉ मंजु ,वह किस्सा भी सुन लीजिये - लड़के पेपर दे कर निकले तो हम बड़े खुश-खुश उनके पास पहुँचे ।
सोचा था बहुत संतुष्ट होंगे ।हमने पूछा ,'क्यों अबकी बार पेपर कैसा रहा ?'
'जी सर ,पता नहीं किस हरामी ने सेट किया था ,ढंग के क्वेश्चन ही नहीं फँसे ।'
दूसरा बोला ,' एक्ज़ामिनर साला ,भाँग खा के बैठा होगा ।अरे हर खंड के कुछ खास कोश्चन होते हैं वह गधा उन सबको चर गया ,भाषा ही बदल डाली ।समझ में आता क्या खाक ! '
 'कमाल है ,' हमारे मुँह से निकला और
एक सम्मिलित ठहाका वातावरण में गूँजने लगा ।
यह है विश्वविद्यालय के छात्रों का एक नमूना ।
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बुधवार, 28 अप्रैल 2010

पि. 5. -युगान्त के बाद

बहेलिये के एक तीर ने युग का अंत कर दिया . श्री कृष्ण का महाप्रस्थान और ऐश्वर्यमयी द्वारका समुद्र में विलीन ! बलवान काल के आगे अर्जुन के बाणों की प्रखरता क्षीण पड़ गयी थी । द्वारका से श्री कृष्ण के रनिवास को सुरक्षित लाने का प्रयास भीलों द्वारा मार्ग में उनके हरण का कारण बन गया .
सब कुछ बदल गया था ,लेकिन जीवन का क्रम अनवरत चलता रहा ।महाभारत के साथ बहुत-कुछ बीत गया .हर विपद् में सहारा देनेवाला अभिन्न मित्र खोकर नर एकाकी रह गया.प्रिय सखा अब कभी नहीं मिलेगा जान कर भी पांचाली ,दिन बिताती रही .
और फिर प्रस्थान की बेला आ गई .
पाँचो पाँडव द्रौपदी के साथ हिमालय की ओर चल पड़े.
हिमालय के भव्य और दिव्य परिवेश में आगे और आगे और ऊपर चढने लगे वे पाँचो अपनी सहधर्मिणी द्रौपदी को लिए .
शिखर-शिखर चढ़ते जा रहे थे ,जीवन भर संघर्ष से थके प्राणी .अंत में विजय मिली थी, पर क्या-क्या मूल्य चुकाना पड़ा .
आरोहण का क्रम जारी रहा .भयंकर शीत ,पग-पग पर धमकाती उद्दंड हवायें पल-पल विचलित करती जीवनी-शक्ति खींचे ले रही हैं.लड़खड़ाते ,एक दूसरे को सहारा देते बढ़े जा रहे है धीरे-धीरे !
सर्व प्रथम द्रौपदी की सहनशक्ति ने जवाब दे दिया . अग्नि-संभवा पाँचाली जीवन भर ताप झेलती रही .उसके जीवन का उपसंहार हो रहा था चिर-शीतल शिखरों के बीच .
गिर पड़ी द्रौपदी .
द्रुत गति से अर्जुन आगे आए .वही लाए थे उसे कितने स्वयंबर में जीत कर ,अपने पौरुष की परीक्षा देकर .
प्रिया को अंतिम क्षणों में बांहों का सहारा देने आगे बढ़े .
'नहीं .'युधिष्ठिर ने रोक दिया .
,'अब उसे किसी की आवश्यकता नहीं बंधु,उस ओर अकेले ही जाना है .'
जिस नारी ने जीवन भर हमारा साथ दिया आज हम उसके लिए कुछ नहीं कर पा रहे हैं .क्या कभी कुछ कर पाए ?आज भी इतना विवश क्यों हैं पार्थ ?
द्रौपदी ने क्षण भऱ को नेत्र खोले .पाँचो पर दृष्टिपात किया ,अर्जुन पर आँख कुछ टिकी .जैसे बिदा मांग रही हो .बहुत धीमें बोल फूटे 'हे गोविन्द!'और जीवन भर जलनेवाली वह वर्तिका बुझ गई .
..भीम के आगे बढते पग थम गए .नकुल,सहदेव स्तब्ध .
अर्जुन ने आँसू छिपा लिए .भीम धम्म से वहीं बैठ गए .
युधिष्ठिर स्थिर हैं .
बस अब कुछ नहीं है यहां .चलो, आगे चलो .
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पि. नं.4.- गाय का सींग

*
बहुत छोटी थी तब की एक घटना है .
याद इसलिए आ गई कि अभी थोड़ी देर पहले मेरा 7-8 साल का पोता मेरे पास आकर बैठा और होंठों के साइड में घाव के छोटे-से निशान पर पर हाथ रख कर बोला ,'बड़ी मां ये क्या है ?'
बच्चे को तो बताना ही था -हुआ यह था कि
तब हमलोग मध्य-प्रदेश -तब मध्य-भारत -के एक छोटे से शहर अमझेरा में रहते थे..मेरी एक सहेली थी सरजू ,हम दोनों के घर आमने सामने थे .
बीच में एक मैदान था जिसमें बच्चे खेलते थे और लोगों के गाय-गोरू भी बँधते थे .
तब घरों में गायें पालने का रिवाज था .चारे के भारे लाद-लाद कर घसियारे चक्कर लगा कर बेंच जाते थे .मां पूर्णिमा और अमावस को चारे के भारे खरीद कर गायों को खिलाती थीं .
उस दिन पूर्णिमा थी ,मेरी माँ ने गायों को चारे का गट्ठर डाला था .कई गाएं खा रही थीं .
हम लोग बाहर खेल रहे थे .
खेलते-खेलते ,सरजू और मेरा झगड़ा हो गया .
खेल खतम .कुछ देर खड़े रहे कि आगे क्या हो फिर वह मुँह चिढ़ा कर अपने घर भाग गई .मैंने भी मुँह चिढ़ाया था पर वह भाग चुकी थी उसने देखा ही नहीं .
मैं खड़ी मैदान में .
गाएँ चारा खाए जा रही हैं .उन्हीं में सरजू की गाय भी है .
ये इसकी गाय क्यों खा रही है ?चारा तो मेरी माँ ने डाला है .जब सरजू का मुझसे झगड़ा है तो उसकी गाय क्यों खाए यह हमारे घर का चारा ?
उसकी गाय उस समय गट्ठर में से एक पूला बाहर खींच रही थी .
मैं तुरंत बढ़ी आगे और खींचे हुए पूले का दूसरा सिरा पकड़ कर उसके मुँह से खींच लेना चाहा .
गाय ने मुंह घुमाकर जो सींग मारा ,गहरा घाव हो गया था .बस ये कहो गाल के आर-पार नहीं हुआ.

उसके निशान आज भी मेरे बाएँ गाल पर होंठ के साइड में विद्यमान हैं .
पोता सुनता रहा .फिर उठा और एक बार और मेरा निशान छू कर देखा .पूछा ,'दर्द तो नहीं होता ?'
उत्तर पाकर मुस्कराता हुआ चला गया .
मैं समझ गई उसे किसने भेजा है .
ये बातें सिखा कर और कौन भेज सकता है ! हँसें रहे होंगे दोनों मिल कर !
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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

पि. नं.3.दादा चुप !

बात सलूके की भी आई थी ।तो और सुनिये-
हमारे एक दादा ,डिप्टी इन्सपेक्टर ऑफ़ स्कूल्स थे ।
काफ़ी टूरिंग करना पड़ता था पर खातिर भी खूब होती थी ।
दादा ने ही बताया था ।एक बार सर्दी के मौसम में किसी गाँव के स्कूल में दौरे पर गये ।रात में वहीं रुकने की व्यवस्था हुई ।
गाँव में खेती की चीज़ें तो सुलभ होती हैं ।गन्ने का रस आजाता था रसावर बनने के लिये औरघड़े में भर कर सिरका भी अच्छा तैयार हो जाता था ।तब गुड़ बनने का मौसम था ।
खुले में बड़े-बड़ कढ़ाहों में भर कर गन्ने का रस औटता रहता था ।सोंधी गंध से बातावरण महक उठता था (यह तो मैंने मुज़फ़्फ़र नगर में खूब देखा है ,वहां तो तपते हुये गुड़ में मेवा डलवा कर साल भर के लिये जमवा लेते थे ।)जाड़ों में ताज़ा गुड़ दूध के साथ अच्छा लगता हो और फ़ायदा भी करता है ।और गर्म गुड़ तो खाना खाने के बाद मज़े से खाया जाता है ।
तो खाना खाने बाद दादा से पूछा गया गर्म गुड़ खानो को ।उन्होंने कहा ,'ले आओ ,थोड़ा-सा ।'
एक आदमी भट्टी पर दौड़ा गया ।गर्मागर्म गुड़ आया ।काहे पर ?
कोई बर्तन तो वहाँ था नहीं सो एक ग्राँववाले ने एक कपड़े को फैला कर उस पर गुड़ धर दिया .आदमी ने लाकर दादा के सामने प्रस्तुत कर दिया ।
दादा ने देखा ,'ये काहे पर रख लाये हो ?'
'कुछ नहीं साब ,कपड़ा मिला उसी पर रख लाये ।'
कपड़ा ?हुँह तो किसी औरत का सलूका था ।
दादा चुप ।
'नहीं,नहीं ।गुड़ खाने की बिल्कुल इच्छा नहीं है ।'
बड़ी मुश्किल से उन्होंने उस दिन उस गुड़ से पिण्ड छुड़ाया ।
मैंने पूछा,'दादा ,सच्ची में सलूका था ?'
'और नहीं तो क्या !पहले अम्माँ भी तो पहनती थीं ।हमें क्या पता नहीं ?बिल्कुल किसी औरत का उतारा हुआ सलूका था ।'
मेरे मुँह से निकला ,' सलूका ! चलो ,फिर भी गनीमत है ।'
भाभी मुस्करा रहीं थीं और दादा बेचारे फिर चुप !
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पिटारा नं . 2 .- वाह चाट !

बात बाहर जाकर चाट खाने की हो रही थी ।
,दिल करता है खाते चले जाओ ..' वृंदा ने बताया था ,'खूब करारी सिंकी टिक्की और गोलगप्पों का क्या स्वादिष्ट पानी कि खाते चले जाओ ,जी न भरे ।'
सोचा आज वहीं चला जाये ।
पहुँचे ।देशी घी की महक बाहर तक आ रही थी ।कुछ लोग डटे थे आलू की टिक्की ,कचौरी वगैरा खा रहे थे ।इधर पाँच-छः लोग हाथों में दोने पकड़े खड़े थे ,चाटवाले का एक आदमी स्टील के बाल्टे के पास बैठा गोल-गप्पों में मटर भर-भर कर उन्हें बाल्टे में दुबो-डुबो कर बारी-बारी से उनके बढ़े हुये दोनों पर देता जा रहा था जिसे फ़ौरन खा लेते थे और दोनें में गया पानी पी डालते ।
हमने भी पहले गोलगप्पे खाये । स्वादिष्ट थे ।
फिर हमलोग अंदर लगी हुई मेज़ो पर जम गये ।
दो छोकरे ग्राहकों की सर्विस में लगे य़े -यही बारह-चौदह साल के । वालों में तेल चमक रहा था पसीना भी होगा ।मौसम गर्मी का था नेकर कमीज़ पहने ।
प्लेटों में चटनी हालते समय एक लड़के के हाथ में लग गई ,उसने फ़ौरन हाथ नेकर की बैक पर रगड़ लिये ।ये लोग जब हाथ धोते तो पोंछते थे लिये पहने हुये नेकर की बैक पर ।कभी नाक छूते कभी पसीना पोंछते अपने काम को अंजाम दिये जा रहे थे ।
इधऱ-उधर निगाह डाली ,कहीं कोई तौलिया या अँगौछा नहीं दिखा कि लड़के हाथ धोकर पोंछ लें ।हाँ, गाहकों के लिये जरूर वाशबेसिन के नल के पास खूँटी पर एक छोटा-सा टॉवेल लटक रहा था ।
हथ धोने की जरूरत तो सबसे ज्यादा इन लड़कों को है ।पर उनके नेकर का बैक ही उनका पुछना है ।
मन गहरी वितृष्णा से भर उठा ।
चाट का सारा स्वाद बेस्वाद हो गया था किसी बहाने से उठ कर भागे वहाँ से ।
जितनी गन्दगी मिक्स होगी ,चाट उतनी ही स्वादिष्ट होगी - हमारे जीजाजी ने ठीक कहा था ।कहा तो उन्होंने यह भी था कि देशी घी तो कहने के लिये है कितना डालते हैं कुछ पता नहीं ,हाँ बीच-बीच में आग पर टपका देते है, वह घी असली ही होता है ।
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पिटारा नं. 1.- गार्डियन

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मुझे- देख-देख कर हँसी आती है ।एक छोटा-सा बच्चा भी ,अगर वह लड़का है तो अपने को अभिभावक समझने लगता है ।मैं अगर ठीक से कपड़े न पहने होऊँ तो शर्मिन्दगी मेरे बेटे को होती है ।वह पूरा ध्यान रखता है ।
जब में नहा कर निकलती हूँ तो पेटीकोट-ब्लाउज़ पहने - घर में और कोई नहीं होता - हाथपाँव में क्रीम लगाना ,बाल काढ़ना आदि काम कर लेती हूँ .साड़ी पहनने के लिए कमरा अधिक ठीक जगह है .

उसे इस पर आपत्ति होती है ।मुझे फ़ौरन टोकता है - 'मम्मी ,ठीक से कपड़े पहनिये ।'
और ख़ुद चाहे टायलेट से आया हुआ शेम-शेम ही खड़ा हो !
*नहा कर ,पेटीकोट-ब्लाउज़ पहने ,बालों में तौलिया लपेटती जब बाथरूम से निकली .
सनी ने इलास्टिकवाला जाँगिया उतार फेंका था और सिर्फ़ बनियान पहने बराम्दे में खेल रहा था .
मुझे आते देख खड़ा हो गया .
कुछ क्षण ध्यान से देखा फिर बोला ,मम्मी ,थीक छें कपले पेनो .

मैने ध्यान नहीं दिया .तौलिया खोल कर बाल झाड़ने लगी ..वह ज़ोर से चिल्लाया- मम्मी .
क्या है- मैंने पूछा
कपले पेनो .
पहने तो हूँ ने अपने पर सावधानी से नज़र डालते हुए कहा .
थीक छे पेनो .
अच्छा तो ये बात है -मेरे खाली पेटीकोट-ब्लाउज़ पहनने पर इन्हें ऑब्जेक्शन है .
,ज़रा ख़ुद को तो देखें न जागिया न शर्ट ,सिर्फ़ बनियान पहने खड़े है और मुझ पर ताव दिखा रहे हैं .
मुझे हँसी आ गई ,
सनी माँ को अधूरे कपड़े पहने देख खिसियाय़ा ,पास आकर फिर चिल्लाया -मम्मी कपले पेनो ,धूती पेनो अब तो हँसी रुक नहीं रही ,निर्झर की अबाध धारा सी बही चली आ रही है ,हँसे चली जा रही हूँ .आँख-नाक-मुँह ,सब हँसी से भरे हुए .
सनी माँ को इस रूप को किंचित् क्रोध से देख रहा है ,और कपले पेनो की रट लगाए है .उसे मां का व्यवहार बड़ा अनुचित लग रहा है .
हँसती हुई कमरे में घुस गई .
सुनो ,तुम्हारा बेटा अभी से मेरा गार्डियन समझने लगा है अपने को ..
*