बुधवार, 9 जून 2010

नहीं, नहीं, नहीं !

हेमा -
वह मेरी छात्रा रही थी आज से आठ वर्ष पहले - खूब लंबी-सी ,साँवली-सलोनी हेमा .
उसे देख कर मुझे लगता मैं पढ़ा रही हूँ ,और यह अपने् में मगन ,जैसे मन ही मन हँसे जा रही हो .
'क्यों ,क्या बात है हेमा ?'
'कुछ नहीं दीदी,' खड़े हो कर वह बोलती .
एक बार तो बेंच पर खड़ा कर दिया था इसीलिए. पढ़ने में साधारण थी .और कोई बुराई नहीं थी बस डाँटो तो भी लगता था हँस रही है .
फिर सुना हेमा की शादी हो गई.
 ससुरालवाले पढ़ाना नहीं चाहते.लड़कियों के साथ अक्सर ही ऐसा होता है

 किसी ने बताया था एक बच्चे की मां बन गई कच्ची-सी हेमा.

स्कूल में दिखी थी एक बार .पीली-सी ,दुबली-सी .पर चेहरे पर वही हँसी थी.

मेरे सामने आते शर्मा रही थी .मैंने ही आवाज़ दे कर बुलाया था .

'हेमा,ससुराल में भी ऐसे ही हँसती हो न .'

'नहीं दीदी ,हर समय दाँत खोले रखना किसी को अच्छा नहीं लगता .

मैं धक् से रह गई थी.

हँसने पर सबसे पहले मैंने ही टोका था उसे .
हमारे यहाँ एक शिक्षिका की नियुक्ति हुई ,हेमा उनकी संबंधी थी .
समाचार मिलते रहे.
आदमी ने पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी .पिता की दुकान पर बैठने लगा .फिर यार-दोस्तो में रमने की आदत पड़ गई.

घर में हेमा की कदर घट गई थी , ऊपर से दो बच्चे .

वह कुछ कहती तो चिल्लाता ,'तुझसे क्या मतलब सुसरी ,खाने-पहनने के लिए मिलता है और क्या चाहिए .हमारे ऊपर सासन करना चाहे तो जूता लगा देंगे .'

एक विधवा जिठानी हमेशा सिर पर सवार रहती थी .
आदमी की आदतें  बिगड़ी हुई थीं.
 एक बार एक काली-सी औरत को घर भी ले आया था .पड़ोसियों से पता लगा था.बहुत दिनों से उससे संबंध था ,

बच्चों के लिए वह जुम्मेदार थी .जिसके अत्यचार सहकर उसने बच्चों को धारण किया ,क्या उसके मन ने उसे कभी सहजरूप में स्वीकारा होगा !और जब तक वह जी अपने बच्चों को सामने-सामने दुरदुराया जाता देख उसे कैसा लगता होगा - मैं सोच कर विचलित हो जाती .
पर सबकी निगाहों में हेमा दोषी है ,जिस आदमी ने कभी उसके साथ न्याय नहीं किया वह निर्दोष !

एक बार वह मायके भाग आई थी बिना किसी को बताए .

घर पर माँ-बाप ने मुश्किल कर दी .

मैने कहा था ,'मत भेजो इसे वहां .पढ़ने का खर्च मैं दूंगी .पढ़ा कर नौकरी करा दो ।'

हेमा ने मेरे पांव पकड़ लिए थे .'दीदी,मुझे वहां मत भेजो .'
उसकी माँ आड़े आ गईँ -
'आप समझती क्यों नहीं ?हमें और भी लड़कियां ब्याहनी हैं .'

फिर इसका आदमी छोड़ेगा इसे .जरा में कह दिया ये बच्चे ही मेरे नहीं हैं तो हम क्या कर लेंगे उसका ?इतना कलंक लेकर कहां जी पाएगी यह !'

माँ रो रही थी .इससे अच्छा था मर जाती झंझट खत्म होता .
फिर सुना वह अपने रिश्तेदारों के साथ आय़ा था औऱ सड़क पर घसीटा था हेमा को .

उसके बाप को धमका गया तुम कुछ भी बोले तो हवालात में बंद करवा दूंगा .

फिर चार बरस हेमा मायके नहीं आई.

जिसे हँसने पर डांटती थी वह हेमा कितने साल बिलकुल नही हँसी होगी !

अब वह कभी नहीं हँसेगी . इस हँसी और रुदन से मुक्त हो गई वह .

मेरी आँखें क्यों भरी आ रही हैं ?मेरा उसका कोई संबंध नहीं था .कुछ साल मेरे क्लास में रही थी ह अपने हँसते चेहरे पर डाँट खाती .

बार-बार आंसू उमड़े आ रहे हैं .

मैं समझ रही हूं ,उन स्थितियों में जीना ,किसी के लिए संभव नहीं .

जो विद्रोह करता है वह जी लेता है ,जो नहीं कर पाता वह मरने पहले भी बार-बार मरता है .

जीवन भर कुढ़-कुढ़ कर रहने से अच्छा एक बार मर जाना या डट कर लड़ना .प्रकृति में सदा से यह होता आया है ,जो समर्थ है जीता है ,असमर्थ मिट जाता है ,चाहे वह स्वयं को मिटाले या दूसरे उसे मिटा दें .

क्वाँरी लड़की से माँ कहती है ,अपने घर जाकर अपना मन पूरा करना .पर अपना घर मिलता है क्या ?,कहीं कोई अधिकार होता है क्या ?

साथ की एक शिक्षिका ने कहा था 'सुसाइड करना कायरता है .'

इन्सान पागल हो जाए उससे अच्छा उस अभिशापमय जीवन से मुक्त हो जाना नहीं है क्या ?'

एक और अधपका व्यक्तित्व निर्ममता से तोड़ डाला गया .


उसे शुरू से ढाला गया था -सीधी बनो ,सुशील बनो ,सब कुछ सह लो ,किसी को जवाब मत दो .लड़की का धर्म है सब के अनुसार चलना .

हेमा के साथ जो हुआ,उसमें  कुसूर किसका ?
शुरू से कह- कह कर कि अपना मत सोचो ,अपनी इच्छा कुछ नहीं, दबा दिया था उसका मन .
पिर भी दोष उसका है ?

जिनने उसे मरने के लिए विवश किया वे निर्दोष हैं ?

वह बीमार नहीं थी ,उसका दिमाग़ खराब नहीं था .-हां बाद के दिनों में बड़ी हताश और थकी-हारी लगती थी .

वह कर्कशा नहीं थी ,होती तो दूसरों का जीना दूभर कर देती .,मां-बाप ने इतना निरीह बना कर इस क्रूर दुनियां के अयोग्य बना दिया था.
सबसे बड़ी जुम्मेदारी उस आदमी की जो माँ-बाप के पास से ले गय़ा था ,जिसमें अपनी कोई की सामर्थ्य नहीं थी ,बस अपने को उस पर थोपता चला गया .
वह उसे छोड़ गई क्या बुरा किया ?
यंत्रणा कितनी वीभत्स होती है .
सारी दुनिया को बहका सकती हूँ ,धोखा दे सकती हूँ अपने को भी, पर कलम से नहीं .उससे भेद नहीं चल पाता .
हाथ में कलम लेकर निर्भय हो जाती हूं सब-कुछ कहने के लिए .
एक दुर्निवार आकर्षण है जो मेरा मन इसे सौंप देता है ,अपने असली रूप में .

हथ में कलम लेकर कुछ सोचती नहीं बस लिखती हूं .वह चलती जाती है मैं चुप .

उसके जीवन पर पति का अधिकार रहा , उसका नहीं .सहते-सहते सीमा पार हो गई होगी मन ने विद्रोह किया होगा , तब उसे बता दिया गया होगा कि मुझसे बच कर जी नही सकतीं .

वह चली गई है ,चार दिन में सब ठीक हो जाएगा .रो-धो कर सब शान्त हो जाएँगे

आदमी दूसरा ब्याह कर लेगा ,बच्च रो-झींक कर चुप हो जाएँगे .

पर अपना ध्यान बार-बार उधर जाने से रोक नहीं पाती .

बात चाहे किसी की हो मेरा मन मुझे कटघरे में खड़ा कर बहस करने लगता है .

दारुण से दारुण वेदना सह कर भी आदमी थोड़ा और जी लेना चाहता है .

 अपने-आप को कोई मार लेता है -क्या आवेश में?

नहीं ऐसी लड़की आवेश में अपने को नहीं मार सकती .

इसके पीछे बड़ी लंबी विचारणा रही होगी ..पहले तो अपने न रहने की कल्पना कर वह रोई होगी .

अपने बच्चों का सोच-सोच कर व्याकुल हुई होगी .उनकी निरीह दशा पर कितनी अशान्ति झेली होगी उसने.

और रास्ते भी ढूँढे होंगे .

जब सब कुछ असहनीय हो उठा होगा ,कुछ न कर पाई होगी ,तब हार कर उसने यह आखिरी कदम उठाया होगा .

मन की पीर हो या तन की सहने की एक सीमा है .
ऐसे निर्णायक क्षण ,पुरुष के जीवन में आयें तो वह बौखला जाता है .क्रोध में या उन्मत्त हो ,चीख-पुकार मचाता है .अपना ग़ुबार निकाल लेता है .और हेमा ....कोई रास्ता नहीं उसके पास !

 सोच रही हूँ जीवन का अंत दुखमय क्यों  होता है -भीषण हा-हाकार ,रुदन से भऱपूर !कैसा जीवन है -प्रारंभ और अंत दोनों दुखमय और इसके बीच में क्या मिलता है -सुख,आनन्द ,संतोष ?
नहीं , कुछ नहीं,कुछ भी नहीं !
*
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*

2 टिप्‍पणियां:

  1. "जो विद्रोह करता है वह जी लेता है ,जो नहीं कर पाता वह मरने पहले भी बार-बार मरता है .जीवन भर कुढ़-कुढ़ कर रहने से अच्छा एक बार मर जाना या डट कर लड़ना .प्रकृति में सदा से यह होता आया है ,जो समर्थ है जीता है ,असमर्थ मिट जाता है"

    "मन की पीर हो या तन की के सहने की एक सीमा है"

    "कैसा जीवन है -प्रारंभ और अंत दोनों दुखमय और इसके बीच में क्या मिलता है"

    क्या कहूँ आपकी लेखनी के बारे में शायद मेरे पास शब्द कम पड़ जाएँ बहुत मार्मिक और सटीक लेखनी है आपकी ऐसा लगा की यह शब्द सीधे दिल से निकले हैं और सीधे दिल तक पहुंचे हैं मैंने अब तक किसी ब्लॉग पर इस तरह का लेखन नहीं पड़ा यह एक साहित्यिक रचना है जिनकी तुलना मैं महादेवी वर्मा के संस्मरणों के साथ कर सकता हूँ | मेरी शुभकामनाएं हमेशा आपके साथ हैं ऐसे ही लिखती रहिये|

    कभी मेरे ब्लॉग पर भी तशरीफ़ लायें -http://jazbaattheemotions.blogspot.com/

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  2. ''कैसा जीवन है -प्रारंभ और अंत दोनों दुखमय और इसके बीच में क्या मिलता है -सुख,आनन्द ,संतोष ?''

    :(:(:(

    उग्र दिमाग फिर तरह तरह के संवाद ढूंढ रहा था...इस पोस्ट पर कुछ लिखने के लिए.......मगर ह्रदय द्रवित हो उठा सिर्फ और सिर्फ हेमा जी के बारे में सोच सोच कर.....और वही एक उत्तर..जो मैं भी कभी अपने आप को दिया करती हूँ.......कि,' ..सबको सब कुछ नहीं मिलता.....मगर हिम्मत नहीं हारनी चाहिए....कभी-कभी हिम्मत आपके अंदर अपने से ही आ जाती है......पर कभी कभी....हिम्मत के vaccine देने की ज़रुरत आन पड़ती है.....न मिले तो इंसान कमज़ोर होकर खुद को ख़त्म कर लेता है...

    ''उससे आगे वह बौखला जाता है .क्रोध .उन्मत्त हो ,चीख-पुकार क्या नहीं करता .''
    मैं भी यही सोचती हूँ जब भी किसी प्रताड़ित व्यक्ति की आत्महत्या के बारे में सुनती हूँ..क्यूँ नहीं वो प्रताड़ित करने वाले को मारकर मरता..:(..????....

    मगर smoothly run करती ज़िन्दगी में रहते हुए ये कहना आसान है शायद......

    खैर.......शिक्षा ही सबसे अच्छा उपाय है हर तरह से......ये आत्मनिर्भरता देती है....जिसके कारण आप एकाकी जीवन भी आराम से आत्मसम्मान के साथ जी सकते हैं......
    प्रतिभा जी,
    आपके लेख या संस्मरण के शुरू होते से ही...धीरे धीरे मारे गुस्से के आँखें जलने लगी.....जब हेमाजी ने सुसाईड किया......तब और गुस्सा आया........मगर अंत तक आते आते झाग की तरह सारा क्रोध शांत हो गया.....आपने समापन ही ऐसा किया है...कि ज़ेहन के हिसार में मात्र हेमा जी रह जातीं हैं.......उनकेस्थान पर स्वयं को रखकर देखने भर से ही ह्रदय व्यथित हो गया......
    अंतिम क्षणों में उनकी क्या मनोदशा रही होगी...बहुत ही मार्मिक चित्रण किया है उन भावों का.........:( मनोवैज्ञानिक भी यही कहते हैं.....आवेश में आकर क़त्ल किये जाते हैं..आत्महत्याएं तो एक लम्बी मानसिक उलझन का परिणाम होतीं हैं .......:(

    और क्या कहूं??? संस्मरण है तो......हेमा जी जहाँ कहीं हों....ईश्वर उन्हें शांति दें......!!
    मन भारी हो गया...:(

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