बुधवार, 30 जून 2010

लुगाइयाँ

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ड्राइँगरूम में अखबार छाँट रही थी इतने में दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई ।मेरे पति किचेन में चाय का पानी रखने चले गये थे ,इस समय की चाय वही बनाते हैं और मैं चाय पीकर काम में लगती हूँ ।मैनें ध्यान नहीं दिया कौन आया है ,किचेन से सामने दिखाई देता दै , देख लेंगे अपने आप.
'अरे ,ये क्या हो रहा है?'
पड़ोस की शीला की ज़ोरदार आवाज़ सुन कर मैं चौंकी , कुछ दुर्घटना हो गई क्या? कहीं आग तो नहीं लग गई ?
अखबार फेंक कर मैं चिल्लाई ,'क्या हो गया ?
'अरे ,यहाँ क्या कर रहे हैं आप ?' शीला कफ़ी उत्तेजना में थी ,
'जाइये ,निकलिये आप !'
इतने में हड़बड़ाती हुई मैं पहुँची ,'क्या हुआ शीला ,क्या हुआ?'
'हुआ क्या ?भाई साब आप क्या कर रहे हैं यहाँ..यहाँ किचेन में?'
ये हकबका गए -
'ज़..जरा,चाय बना रहा था ।'
'जाइये ।हमें नहीं अच्छा लगता आप करे यह सब ।लाइये हम बना दें चाय।'
कहकर शीला मेरी ओर उन्मुख हुई ।
'उन्हें चौके में घुसा दिया,और आराम से वहाँ बैठी हो ?'
'आराम से बैठी हूँ !अखबार छाँट कर लगा रही थी ।पता है सुबह से क्य-क्या कर चुकी हूँ ?'
' उससे क्या फ़रक पड़ता है! मैं तो अभी की बात कर रही हूँ तुम यहाँ मज़े से न्यूज पढ रही हो और वो वहाँ धंधे में लगे हैं ।
मैने सोचा अगर मज़े से भी बैठी होऊँ तो इसे क्या परेशानी ।
पति हड़बड़ा कर चौके से बाहर आ गये थे ,झेंपे हुये से -जैसे चाय बनाना कोई अपराध हो ।
मैंने कहा ,'अच्छा, तो तुम चाय बना रही हो शीला ?ठीक मुझे यहीं पकड़ा देना और चाहो तो अपने लिये एक कप पानी और बढ़ा देना ।मैं तब तक अख़बार निपटा लूँ ।'
मैंने उसकी ओर देखा ही नहीं और बोलती गई ,' ड्राइँगरूम में लेती आना शीला ,यहीं पी लूँगी ।'
उसका बस चलता तो मुझे कच्चा चबा जाती ।
पता नहीं ये महिलायें इस टाइप की क्यों होती हैं और कैसे होती हैं । किसी दूसरी के आदमी को जहाँ घर का कुछ काम करते देखा उनका जी एकदम दुखने लगता है फ़ौरन दौड़ती हैं ,'अरे,अरे आप यह काम कर रहे हैं ।लाइये हम कर दें.'
पराये आदमी को उसके ही घर का काम करते देखना उनके लिये कष्टकर होता है ।उसकी पत्नी को सुनाती हैं,'अरे भाई साहब तो इतना काम करते हैं ,एक हमारे ये हैं जिनसे अपने आप गिलास भर कर पानी भी नहीं भी पिया जाता ।'
मैं सोचती हूँ -नहीं पिया जाता तो मैं क्या करूँ ?तुम जानो वे जाने ।हमारे यहाँ तमाशा क्यों खड़ा कर रही हो ?
चाहे बहिन हो चाहे भाभी .अपनी बहिन या ननद से उन्हें सहानुभूति नहीं होती ।ऐसे मौकों पर पराये आदमी का दुख देख उनका जी तड़प जाता है .बाढ़ की तरह सहानुभूति उमड़ती है और उसकी पृष्ठभूमि में चलती हैं अपने आदमी की शिकायतें !बड़ी उलाहने भरी टोन होती है ।उनका बस चलता तो इस पराये पुरुष की जगह अपने ब्याहे को काम निबटाने के लिये ला खड़ा करतीं ।
पर दूसरी महिला और अपना पति तो उस समय कटघरे में खड़े होते हैं ।
अगर महिला काम के बोझ से पिसी जा रही है तो वह उस पर दया का प्रदर्शन कर कुछ चैन पा लेती हैं ।कहेंगी ,'देखा बिचारी को !इतना भी टाइम नहीं कि चैन से खाना खाले !'
उनका मन हल्का हो जाता है ।।
'लेकन उस बिचारी के पति अगर काम में हाथ बँटाने लगें तो उन पर जैसे आसमान टूट पड़ेगा । सारा बिचारापन उसके पति के लिये रिज़र्व हो जायेगा ।कोई-कोई तो सीधे उसके सामने अपने पति से झींकने लगेंगी,'देखो भाई साहब कितना काम करवाते हैं ,और एक तुम हो !'
पति बेचारा चुप !क्या बोले ?रहना तो घर में उसी के साथ है .जल में रह कर मगर से बैर कैसे करे !इधर महिलायें करुणामयी होती हैं उन्हें करुणा करने के अवसर चाहियें . दूसरी महिला की स्थिति दयनीय नहीं होगी तो उन्हें दया करने का मौका कहाँ मिलेगा ।और पराया आदमी ? वह जैसा है बहुत अच्छा है।दूसरे की थाली का लड्डू हमेशा अपने से बड़ा दिखाई देता है ।पराये पति के लिये सहानुभूति के भंडार भरे हैं जिन्हें खोलने से उसकी पत्नी का सिर जतना नीचे झुकता है सहानुभूतिमयी का उसी ही कोण पर ऊँचा उठने लगता है । दूसरी औरत पर तरस खा परम तोष का अनुभव होता है ।
और अगर उनका अपना पति कभी काम कराने को तैयार भी हो जाय तो उन्हें विश्वास है कि यह आदमी कुछ नहीं कर पायेगा ।बात - बात पर टोकती चलेंगी अगर में कुछ करे तो उन्हें बराबर चिन्ता खाये जायेगी -'लेथन फैला रहा है ,कुछ भी ठीक नहीं कर रहा है।'' गैस बेकार फुँक रही है ,घी-तेल की बर्बादी हो रही है ।'तुम रहने दो ,और मेरा काम बढ़ा कर रख दोगे'जब तक आदमी किचेन से बाहर नहीं जायेगा लगातार टोकती रहेंगी ।
अंत में हार कर वह कह देगा ,'लो सम्हालो अपना किचेन ,मेरे बस का नहीं ।'
बस !यही तो वे चाहती हैं ।यही बताना चाहती हैं कि यह सब उसके बस का नहीं ।सच है अगर उसके बस का हो जाये तो इनकी क्या इम्पार्टेन्स रह जायेगी ?
उन्हें पराया आदमी काम करता हुआ बड़ा सुघड़,कुशल और सलीकेवाला लगता है और अपना निरा निखट्टू ,लापरवाह और बे-शऊर !पराया आदमी बड़ा सुशील, बड़ा निरीह और अपना मरद बिगड़ैल बैल दिखाई देता है । मुँह से चाहे न कहें मुद्रा से सब व्यक्त कर देती हैं ।
अगर कुछ कहो तो साफ़ जवाब है -मैने तो कुछ कहा ही नहीं ।
वाह !चित भी मेरी और पट्ट भी ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी ये पोस्ट स्पेशल महिलाओं के लिए ही है पर मुझे इस पोस्ट का टॉपिक बहुत पसंद आया "लुगाइयां" वाह.....एक बार फिर आपके लिकने का अंदाज़ बहुत अच्छा है.....

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  2. आपने मध्‍यमवर्गीय परिवारों की बात कह दी । सच है ऐसे मौकों का मैं खुद शिकार रहा हूं। प्रतिभा जी जहां तक मैंने सुना और पढ़ा है उक्‍ति भानुमती ने कुनबा जोडा़ है। अगर आपने उससे प्रेरित होकर भानमती लिया है तो ठीक है। या कि आप बताएं हमही गलत सुनते आ रहे हैं। संभव है सही भानमती ही हो।

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  3. लोक-भाषा की यह कहावत 'भानमती'के नाम से ही चलती है -आप कंप्यूटर पर भी इसी रूप में देख पाएँगे.रुचि लेने हेतु आभार !
    -प्रतिभा सक्सेना.

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  4. प्रतिभा जी आप की रचना बहुत सुंदर लगी क्या आप कानपूर की है मै भी कानपूर का हूँ आज कल संफ्रासिक्को में हूँ

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  5. शीर्षक से अंदाजा नहीं हुआ था पोस्ट का....
    बहुत बढियां तंज किया है प्रतिभा जी महिलाओं पर...ये बात तो खीर..मुझे भी सदा ही नापसंद रही है उनकी....
    पहले जब पढ़ी थी ये वाली पोस्ट तो बहुत सारा कुछ कुछ लिखा था...अब याद नहीं आ रहा....

    ''पराये पति के लिये सहानुभूति के भंडार भरे हैं जिन्हें खोलने से उसकी पत्नी का सिर जतना नीचे झुकता है सहानुभूतिमयी का उसी ही कोण पर ऊँचा उठने लगता है । दूसरी औरत पर तरस खा परम तोष का अनुभव होता है ।''
    हम्म सच में यही होता है.....

    बधाई....अच्छी पोस्ट के लिए...

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