बुधवार, 29 दिसंबर 2010

स्त्री

*
कल हमारे पड़ोसी शास्त्री जी के बहनोई आये थे .
बातों-बातों में बोले -
'हमारे साले शास्त्री जी स्त्री  के बिना बिलकुल नहीं रह  सकते.  समझो बिलकुल बेकार हो जाते हैं.तो  हमेशा साथ लिये घूमते हैं .'
'क्या कह रहे हो ?'
'सच कह रहा हूँ .'
'अच्छा.तुम्हीं से सुना ,और तो कोई नहीं कहता ?'
 'तुम ख़ुद देख लो ,कोई कहे चाहे न कहे .सच तो सच ही रहेगा '.
किसी की समझ में ही नहीं आ रहा था .
'बहस करने से कोई फ़ायदा नहीं .तुम्हीं देखो ''शास्त्री" की "स्त्री" निकाल दो तो क्या बचा?'
 "शा" .
*

5 टिप्‍पणियां:

  1. यह बढ़िया रही...शुभकामनायें आपको !

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  2. नव वर्ष की हार्दिक बधाई ।

    ((1947 से अब तक)) हाँ अगर आप हैं नाखूश, आप हैं हताश राजनीतिज्ञों के रवैये से तो मन में मत रखिए अपनी बात, करिए उसे खूलेआम ताकि सच्चाई से रुबरु हो हम । गाँव हो या कस्बा या शहर लिख भेजिए सच्चाई हमें और निकलाइए राजनीतिक भड़ास अपने इस मंच पर । लिख भेजिए कोई भी सच्चाई जो करे बेपर्दा राजनीति को । हमारा पता है mithilesh.dubey2@gmail.com तो आईये हमारे साथ http://rajnitikbhadas.blogspot.com पर

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  3. प्रतिभा जी,

    हा..हा...हा......सही कहा आपने इन शास्त्री जी से प्रेमचंद जी के मोटेराम शास्त्री की याद आ गयी.....बहुत खूब|

    नववर्ष की ढेरों शुभकामनाओं के साथ|

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