शुक्रवार, 3 दिसंबर 2010

घर और घाट

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मेरे साथ की एक प्रवक्ता खीझ कर कहा करती थीं ," साठ की हो जाऊं फिर किसी की नहीं सुनूँगी ...."

वह सोचती थीं साठ पार करते ही ,छूट मिल जाएगी !

कहती थीx ,"और रुके है थोड़े दिन .पार हो जाने दो साठ ,फिर तो जिसके साथ चाहें निश्शंक बोलेूँ . किसी से छिपा कर क्यों चौराहे पर खड़ी हो कर हँसूँगी, बोलूंगी ,

"अभी तो ज़रा सा किसी के साथ बैठ कर कुछ डिस्कस कर लिया तो लोगों की निगाह में तमाशा बन जाते हैं -ये कोई नहीं देखता कि हमारी उम्र क्या है , भावना क्या है . बस निगाहें तौलने लगती हैं ये क्या कर रही है,क्यों कर रही है !अपनी कुंठाएँ लाद देते हैं .अरे करूँगी क्या ,बात ही तो कर रही हूँ."

मैं खुद नहीं समझ पाती कि ऐसा क्यों होता है .

"एक उम्र के बाद तो कम से कम इस सबसे मुक्त कर दो ,एक व्यक्ति के रूप में- अपनी रुचियों के अनुसार निश्चिन्त हो कर जी लेने दो,"

अक्सर तो उसे चिढ़ा कर उकसाने के लिए के लिए हम लोग छेड़ देते पर उसके कहने में तथ्य था .

हर जगह याद दिलाते रहा जाय -तुम नारी हो ,तुम्हें नारी की तरह रहना चाहिए. .

ग्राम्य शब्दों में कहें तो ,"अरे ,औरत हो औरत,की तरह रहो !"

हमेशा याद दिलाते रहा जाएगा तुम औरत हो, तुमसे जो अपेक्षित है वही करो.और यह हम बताएंगे कि क्या करना कैसे रहना चाहिए .

स्वाभाविक रूप में सहज व्यवहार स्वीकार्य क्यों नहीं ? हमेशा दूसरों के हिसाब से चलें ,उनकी मानते रहें तो ठीक ! नहीं तो ,स्वेच्छाचारी ,निरंकुश, उच्छृंखल ,स्वच्छंद जैसे शब्द गालियां बना उछाले जाएंगे उस पर ! ऊपर से धमकी -न घर की रहोगी न घाट की !(सचमुच घर और घाट दोनों पर एकाधिकार है जिसका वह चाहे जो करे -कौन टोक सकता है उसे!)

जो स्वाभाविक है वही आचरण तो कोई करेगा याद दिलाने की ज़रूरत क्या है ?क्या किसी से कहा जाता है ,माँ हो माँ की तरह रहो ,या बहन हो बहन की तरह रहो .वह तो अपने आप होता जाता है .

इसी का दूसरा पहलू देखिये - ,पति हो पति की रह रहो (पत्नी पर शासन करते हुए)

,या आदमी की तरह (हमेशा तन कर सारे अधिकार समेट कर).

व्यक्ति का व्यक्ति से जो स्वाभाविक संबंध होता है-सहज, उदार .वह स्वीकार्य क्यों नहीं.एक महिला के लिए अपने आप में एक व्यक्ति होने की गरिमा,क्यों नकार दी जाती है ?

एक व्यक्ति के रूप में रहने का अवसर कभी क्यों नहीं मिले -अपने सारे दायित्व पूरे कर चुकने के बाद साठ पार - सत्तर पार कर के भी नहीं . स्त्री है सिर्फ़ इसलिए तमाम वर्जनाओं के साथ जीना उसकी नियति !इस उम्र तक जो अच्छी बनी रही तो अब कोई उसे बिगाड़ नहीं सकता ,और अगर बिगड़ी हुई है तो कोई उपाय उसे सुधार नहीं सकता- यही सोच कर निश्चिन्त क्यों नहीं रह सकते लोग !

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18 टिप्‍पणियां:

  1. विचारणीय पोस्ट ...बहुत -बहुत आभार

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  2. प्रतिभा जी,

    आपकी काफी बातें सही लगीं.....पर ये स्त्री-पुरुष का रोना कब तक?
    ये स्थिति सबके साथ होती है......क्या एक स्त्री विवाह के बाद पुरुष पर एकाधिकार नहीं चाहती और इसको लेकर क्या गृह-क्लेश की स्तिथि उत्पन्न नहीं होती?

    आप बुरा न माने ......ये मनुष्य मात्र के साथ होता है....ये समाज उसे हमेशा से अपने अनुसार चलने को मजबूर करता है...चाहें वह स्त्री हो या पुरुष.....और अगर बात ऊँचे स्तर पर की जाये तो ये भारत जैसे देशों में ही है......यूरोपीय देशों में स्त्रियों को ऐसी कोई परेशानी नहीं.......

    कोई आपको तभी तक बाँध सकता है....जब तक आप स्वयं बंधने को तैयार है......स्वयं से पूछें क्या किसी स्वछन्द महिला को देख कर आप स्वयं ये नहीं कहती की देखो तो सारी मर्यादा, संस्कार ताक पर रख दियें हैं......हमें खुद को बदलना होगा......समाज भी मनुष्यों से ही बनता है|

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  3. इमरान जी ,सही कहा आपने "कोई आपको तभी तक बाँध सकता है....जब तक आप स्वयं बंधने को तैयार है'-स्वेच्छा से बँधा बंधन ढीला भी नहीं करेंगे हम ,पर कहने से भी क्यों चूकें भला !

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  4. chahe aurat ho ya fir mard, koi kisi ke bandhan mein nahi hai, har kisi ko apni zindgi apni marji se jeena ka poora hak hai, baaki sab to is baat par nirbhar hai ki wo apni zindgi kis tarah jina pasand karte hai , bandhano mein bandhi ya fir bediyon se aajaad...

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  5. बहुत उम्दा विषय है...प्रतिभा जी..अक्सर इस विषय पर बहुत बहस होती है माँ और मेरे बीच.......

    मेरा उग्र मत होता है दरअसल कि -
    अगर हम सही हैं....अंतरात्मा से कोई क्षीण से क्षीण पुकार भी हमारे किये का कोई विरोध नहीं करती....उपरवाले का खौफ है दिल में.......तो समाज के तथाकथित ''कोई'' ''किसी'' को क्यूँ किसी चीज़ की प्राथमिकता मिले.....??हम सामाजिक प्राणी हैं...मगर निजी स्तर पर हम इंसान भी हैं...और मन की शांति हमारा एकमात्र ध्येय रहेगा...

    दूसरी बात -
    ''व्यक्ति का व्यक्ति से जो स्वाभाविक संबंध होता है-सहज, उदार .वह स्वीकार्य क्यों नहीं.एक महिला के लिए अपने आप में एक व्यक्ति होने की गरिमा,क्यों नकार दी जाती है ?''

    यहाँ तो मैं ही गलत हूँ या शायद थी..क्यूंकि अब सोच बदल गयी.....:)
    मुझे पहले जैसा लगता था..और ज़्यादातर महिलाएं अब भी शायद सोचती हों...कि ये गरिमा या आत्मसम्मान उन्हें तभी स्वीकार होता है....जब किसी पुरुष के द्वारा प्रदत्त हो.....:(
    अगर मैं स्वयं में चाहूँ कि नहीं मेरी भी एक गरिमा है तो वो तब तक मुझे नहीं पचेगी जब तक कोई पुरुष आके न कहे कि हाँ तरु तुम्हारी गरिमा स्वयं में है..तुम भी एक स्वतंत्र व्यक्ति हो....:(..
    मगर अब मैं समझ गयी......इस चीज़ के लिए किसी के भी प्रमाणपत्र के आवश्यकता कतई नहीं है......

    खैर.....
    बहुत अच्छा आलेख है प्रतिभा जी...........सार्थक लेखन के लिए बहुत सारा आभार है.....

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  6. कहना भूल गयी थी..इमरान अंसारी जी के बात से सहमत हूँ और आपके उत्तर से भी.......ये बात अछि लगी...''स्वेच्छा से बांधे गए बंधन को ढीला नहीं करेंगे ;'' वाली.......:)

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  7. विचारणीय पोस्ट ...बहुत -बहुत आभार

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  8. व्यक्ति का व्यक्ति से जो स्वाभाविक संबंध होता है-सहज, उदार .वह स्वीकार्य क्यों नहीं.एक महिला के लिए अपने आप में एक व्यक्ति होने की गरिमा,क्यों नकार दी जाती है ?
    एक सार्थक आलेख से उठा एक प्रश्न जिसका उत्तर आज भी अधिकतर स्त्रियाँ ढूँढ रही हैं.

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  9. व्यक्ति का व्यक्ति से जो स्वाभाविक संबंध होता है-सहज, उदार .वह स्वीकार्य क्यों नहीं.एक महिला के लिए अपने आप में एक व्यक्ति होने की गरिमा,क्यों नकार दी जाती है ?

    बहुत सार्थक आलेख ........स्थिति तो विचारणीय है ही .... !!

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  10. aap nay jo batein likhi hain...wo hamesha hamare dimag may chalti rehti hain...par jawab sach may nahi milta kabhi.....sochne par majboor karti hai apki post

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  11. रेवा जी की टिप्पणी को ही मेरे विचार भी समझें।


    सादर

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  12. इस पुरुष-प्रधान समाज में हम स्त्रियाँ कितनी भी तरक्की क्यों न कर लें, मानसिक और आर्थिक रूप से कितना भी सक्षम क्यों न हो ले,......स्त्रियों के प्रति ऐसा साश्नात्मक रवैया नहीं बदल सकता...कुछ बदलाव अवश्य है, लेकिन समानता को जो दर्जा मिलना चाहिए, देखिये, कब प्राप्त होता है?

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  13. प्रतिभा जी आपका लेख बहुत अच्छा है. लेकिन मै इमरान जी के कथन से पूर्णतया सहमत हूँ...यह मनुष्य मात्र की समस्या है और समाज हम से ही बनता है अगर हम चाहें तो समाज की सोच भी बदलेगी... आज नहीं तो कल... .
    मंजु मिश्रा

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