गुरुवार, 2 अगस्त 2012

सब एक से

 *
उस दिन अपनी सहकर्मी नित्या के साथ दुनिया भर की गप्पें चल रहीं  थीं.
इतने में देखा क्या  कि  भानमती ,खुले दरवाज़े से भीतर चली आ रही है .चेहरा देख कर लगा कुछ खिसियायी हुई है .
नित्या को भी रुचि है मेरी इस निराली सहेली में.
मेरे टोकने पर हल्के से मुस्करा दी ' ई तो मरदन की दुनिया है !'
'पर हुआ क्या ये भी तो बताओ .'
बोलने लगती है वह,' जइस मेहरारू न होय, कोई जिन्स हुई गई .अरे ओहू तो इंसान है .मेहरारू तुमसे जियादा काम करत है तब ओहिका रोटी मिलत है .का गरीब का अमीर ...'
  नित्या मेरे पास बैठी सब सुनती रही .
'क्या हो गया भानमती ?काहे बिगड़ रही हो ?'
वह हाथ झटक कर बोली ,' ई मरद !हम का का समुझत हैं. न अपनी कहि सकत न हमारी सुनन की ताब , 'औरत हो क्या बात करें' .कोई खासै बात होय तो कहन लगत हैं ,अपने मरद को भेज देना ,काहे? हमसे बात करन में उनकी तौहीन हुइ जात है . एक मरद दूसर की  बातन को जियादा वजन देगा .ऊ आपस में तय करेंगे . का कहे से कि , मरद की मूंछ नीची न हो जायेगी .!  मेहरारू मानेगी नहीं तो जायेगी कहाँ ? पढ़े-बेपढ़े सब एक से !'
उसका कहना था ,एक तो मेहरारुन को उत्ती छूट नहीं ,मार दुनिया भर की रोक-टोक ,सो उनका सोच-वेवहार दुनिया के हिसाब से कैसे बन पाय ? मरदन के इहै लच्छनन के कारन ,सारी रोकें हम लोगन पर ...'


भानमती ,दब्बू किस्म की नहीं है .जाड़ों में जहाँ अलाव जलता है वहाँ अपने साथ के मर्दों के साथ बैठ कर कभी-कभी बीड़ी पी लेती है .
मेरी समझ में एक बात आज तक नहीं आई कि अक्सर लोग स्त्रियों से घबराते हैं, कहते हैं कि वे उन्हें समझ नहीं पाते(क्या दूसरे आदमियों को एकदम समझ लेते हैं)जब कि जन्म से,किसी न किसी रूप में वे उनके जीवन के लिये अनिवार्य रहीं,उनके बिना काम नहीं चला .स्वयं को विशेष प्रकार का मानने की मानसिकता रखने के कारण कभी किसी नारी,चाहे वह उनकी माँ या बहिन ही क्यों न हो ,को अपने समान एक व्यक्ति नहीं मान पाते.
 भानमती तो ग़ुबार निकाल कर चली गई पर एक टॉपिक छोड़ गई .
नित्या का कहना था,' उन्हें रिमोट अपने हाथ में चाहिये ,'


'हाँ ,मैंने भी देखा है .अपने भारत में (विदेशों में नहीं) . काफ़ी लोग स्त्री से  घबराते हैं .'
जो लोग स्त्री को वस्तु समझते हैं व्यक्ति की गरिमा नहीं दें ,तो उसकी अभिव्यक्ति को कैसे समझें ,स्वाभाविक हो कर सुनेगे ही नहीं !  
नित्या का कहना था एक बात बड़ी अजीब लगती है ,  ,जो स्त्री उन्हें इस संसार में लाती है ,पालन-पोषण कर सहज-स्नेह से सहेजती है ,उसे वे प्रकृति की एक वस्तु समझ कर किनारे कर देते हैं
 एक पहेली बना देते हैं ,मुझे तो लगता है ये ख़ुद एक पहेली हैं.'
देखो न ,हमारे यहाँ तो परिवार प्रथा है ,कोई पर्दे का रिवाज तो है नहीं . बचपन से जिनके साथ रहे- अपनी बहिंने ,ममेरी चचेरी ,फुफेरी ,उनकी सहेलियाँ ,माँ उनकी बहनें सहेलियाँ ,तो वे क्या कुछ अलग प्रकार की थीं ?और  बाहर जो मिलती हैं .घर की यही महिलायें तो हैं . '.
' तुम इतना भी नहीं समझतीं ,अपने घर की महिलायें हैं ,बाकी सब तो औरतें ..'
  भानमती की बात पर, यह एक प्रतिक्रिया मेरी  ,सारे मर्द अपने लिये न समझें !
वैसे थोड़ी-सी मर्यादा तो पुरुषों के बीच भी चलती होगी . ,कोई वय में बहुत बड़ा है कोई छोटा ,.विद्वान-मूर्ख ,गंभीर ,चंचल ,उसी हिसाब से व्यवहार करते होंगे ..और संबंधों के आधार पर भी.
पर स्त्री की चर्चा  आते ही सारी सहजता ग़ायब !'
 आश्चर्य काहे का  ? ऐसे लोगों के  अलग-अलग खाँचे कि ये आदमी का, ये औरत का .तब भी उसे चैन नहीं पड़ेगा कि ये लोग ऐसी क्यों हैं ?उसकी हर  गति-विधि पर छिपी  नज़र रखे रहते हैं ,
 हाँ ,आदमी अपने खाँचे में रह सकता है , जाति में रह सकता है रहे .पर स्त्री जब बाहर निकलती है तो उसे आदमियों से भरी दुनिया में रहना होता है ,उनसे व्यवहार किये बिना काम नहीं चलता ,इसे वे , सहज भाव से स्वीकार नहीं कर पाते .'
नित्या ने एक और बात कह दी ,
'हमारे यहाँ के आदमी बहुत समर्थ हैं ,उनकी चले तो विदेशी औरतों को ,पूरी मर्यादा के साथ रहना सिखला दें  और उसका शरीर( जिसे येआँखे फैलाये देखते रह जाते हैं) अच्छी तरह छिपा कर  लाज-शरम की दुहाई देने लगें .'
'औऱ अपनी वालियों को ?'
'उन्हें पुराने ज़माने के कपड़े पहना कर मूँद-ढाँक दें .'
,'और खुद के लिये ?'
'अरे, खुद के लिये कैसी रोक नये से नये ढंग. पैंट से आगे हॉफ़पैंट ,जीन्स ,पूरी आधी ,शर्ट स्लीवलेस या टी शर्ट सब चलेगा .वे तो आदमी हैं ,खुले घूमें तो क्या !'
'और हमारे कपड़े देखते  हैं ,'
' कपड़े ?'
ये नित्या बड़ी बेढब है  .हँसी तो आ ही जाती है .
*

4 टिप्‍पणियां:

  1. पुरुष प्रधान देश की व्यथा

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  2. यहाँ तो पुरुषों की ही चलती है ... अंतिम पंक्तियों में तीखा कटाक्ष है

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  3. जीवन में जो भी जितना अधिक महत्वपूर्ण है..मनुष्य अपनी सहज बुद्धि से उसे हाशिये पर ढकेल देना पसंद करता है..चाहे वो स्त्री हो..वृक्ष हों अथवा कोई और.स्त्रियों के लिए तो हम हर सीमा पार कर देते हैं..क्यूँकी हम वो प्राणी हैं जो देवी माँ के जयकारे लगाते हैं..माता के गर्भ से जन्म लेते हैं ...माता के नाम की गालियाँ देते हैं..और ''यत्र नार्यस्तु..'' का श्लोक भी पढ़ते हैं.जल से भी तरल है हमारे समाज के लिए एक नारी का अस्तित्व.केवल हमें अपनी मानसिकता का पात्र गढ़ना होता है..वो उच्च से उच्च हो अथवा तुच्छ से तुच्छ ...स्त्री तो किसी भी विचारधारा में समाहित हो ही जाती है.
    आजकल स्वामी विवेकानंद और उनके गुरुदेव को पढ़ रही हूँ..नारी शक्ति के अनादर को लेकर स्वामी जी बहुत व्यथित थे..एक जगह कहते हैं..,''क्या कारण है कि संसार में हमारा देश ही सबसे पिछड़ा हुआ और बलहीन है ?क्यूँकि वहाँ शक्ति का निरादर होता है.अमेरिका यूरोप में मैं क्या देखता हूँ?-शक्ति की उपासना..परंतु अज्ञानवश वे उसकी उपासना इन्द्रियभोग द्वारा करते हैं.कल्पना करो कि जो पवित्रता से सात्विक भाव द्वारा अपनी माता के रूप में उसे पूजेंगे ..वे और उनका देश कितने कल्याण को प्राप्त करेगा''.ऐसे भाव रहें तो नैतिक स्तर कोई भी पुरुष मर्यादा से गिर कर आचरण नहीं ही कर सकेगा.पर इतना उच्च भाव हृदय और व्यवहार में ला पाना तो अत्यंत ही कठिन काम होगा.फिर यहाँ तो औरत ही औरत की अधिक दुश्मन है.सारी अपेक्षाएँ केवल पुरुष वर्ग से करना भी न्यायसंगत नहीं है.
    पोस्ट उतनी गंभीर नहीं है शायद जितना गंभीरता से मैंने उसे ले लिया.विषय से भटक के कोई बात कह गयी होऊं तो माफ़ कीजियेगा.मेरे लिए ये लेख बहुत अच्छा रहा.माँ से भी बहुत बात की इस पोस्ट के विभिन्न बिन्दुओं पर ..मसलन 'स्त्रियों से शालीन पहनावे की अपेक्षा करना क्या उनकी आज़ादी को रोकना होगा' या 'महिलाओं से मर्यादित आचरण की आशा रखना अप्रत्यक्ष रूप से पुरुषों के वर्चस्व को स्वीकार करना होगा''.....मैंने काफी सोचा पढ़ने के बाद.आभार ऐसी पोस्ट के लिए :)
    (बहुत बार ये पोस्ट पढ़ी थी..कई बार टिप्पणी देने का प्रयत्न किया...किन्तु कुछ व्यवस्थित और संतुलित लिख ही नहीं पायी.कई बार प्रयत्न किया..हर बार कुछ न कुछ उग्र विचार पूरी टिप्पणी पर हावी हो जाते थे..विवश होकर मैं लिखा हुआ मिटा देती थी.'स्त्री की बुद्धि और विवेक पर पुरुषत्व का गहरा लेप','नारी के अधिकार अथवा अनुचित स्वतंत्रता','आधुनिकता के मापदंड:भौतिक अथवा मानसिक','पुरुष के लिए मर्यादा का लचीलापन'....जैसे कितने और अलग अलग विषयों पर सोचते हुए इस पोस्ट पर अपनी उपस्थिति अंकित करने का बस जतन ही करती रह गयी.
    देरी से आने के लिए क्षमा प्रार्थी प्रतिभा जी!! :(..)

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    1. शब्द भले ही भारी-भरकम न हों ,बात को बहत आसान बना कर सरल लहज़ें कह दिया गया हो लेकिन मूल कथ्य की ओर संकेत कर उस पर अपने ही ढंग से विचार करने को प्रेरित करना चाहती हूँ !

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