शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

पिटारा नं . 2 .- वाह चाट !

बात बाहर जाकर चाट खाने की हो रही थी ।
,दिल करता है खाते चले जाओ ..' वृंदा ने बताया था ,'खूब करारी सिंकी टिक्की और गोलगप्पों का क्या स्वादिष्ट पानी कि खाते चले जाओ ,जी न भरे ।'
सोचा आज वहीं चला जाये ।
पहुँचे ।देशी घी की महक बाहर तक आ रही थी ।कुछ लोग डटे थे आलू की टिक्की ,कचौरी वगैरा खा रहे थे ।इधर पाँच-छः लोग हाथों में दोने पकड़े खड़े थे ,चाटवाले का एक आदमी स्टील के बाल्टे के पास बैठा गोल-गप्पों में मटर भर-भर कर उन्हें बाल्टे में दुबो-डुबो कर बारी-बारी से उनके बढ़े हुये दोनों पर देता जा रहा था जिसे फ़ौरन खा लेते थे और दोनें में गया पानी पी डालते ।
हमने भी पहले गोलगप्पे खाये । स्वादिष्ट थे ।
फिर हमलोग अंदर लगी हुई मेज़ो पर जम गये ।
दो छोकरे ग्राहकों की सर्विस में लगे य़े -यही बारह-चौदह साल के । वालों में तेल चमक रहा था पसीना भी होगा ।मौसम गर्मी का था नेकर कमीज़ पहने ।
प्लेटों में चटनी हालते समय एक लड़के के हाथ में लग गई ,उसने फ़ौरन हाथ नेकर की बैक पर रगड़ लिये ।ये लोग जब हाथ धोते तो पोंछते थे लिये पहने हुये नेकर की बैक पर ।कभी नाक छूते कभी पसीना पोंछते अपने काम को अंजाम दिये जा रहे थे ।
इधऱ-उधर निगाह डाली ,कहीं कोई तौलिया या अँगौछा नहीं दिखा कि लड़के हाथ धोकर पोंछ लें ।हाँ, गाहकों के लिये जरूर वाशबेसिन के नल के पास खूँटी पर एक छोटा-सा टॉवेल लटक रहा था ।
हथ धोने की जरूरत तो सबसे ज्यादा इन लड़कों को है ।पर उनके नेकर का बैक ही उनका पुछना है ।
मन गहरी वितृष्णा से भर उठा ।
चाट का सारा स्वाद बेस्वाद हो गया था किसी बहाने से उठ कर भागे वहाँ से ।
जितनी गन्दगी मिक्स होगी ,चाट उतनी ही स्वादिष्ट होगी - हमारे जीजाजी ने ठीक कहा था ।कहा तो उन्होंने यह भी था कि देशी घी तो कहने के लिये है कितना डालते हैं कुछ पता नहीं ,हाँ बीच-बीच में आग पर टपका देते है, वह घी असली ही होता है ।
*

1 टिप्पणी:

  1. हम्म.......आगाज़ तो इत्ता मज़ेदार हुआ था...कि मन उछलने लगा था....कि वाह! मज़ा आने वाला है....मगर फिर gambheerta ने take over कर liyaa ..:/

    'स्टील के बाल्टे के पास बैठा गोल-गप्पों में मटर भर-भर कर उन्हें बाल्टे में दुबो-डुबो कर बारी-बारी से उनके बढ़े हुये दोनों पर देता जा रहा था जिसे फ़ौरन खा लेते थे और दोनें में गया पानी पी डालते । '

    :):) यहाँ तक पढ़ते पढ़ते क्या कहूं प्रतिभा जी...मैं रिकार्ड तोड़ पानी पूरी खाने वाली प्राणी...रोक नहीं पायी...मुंह गोलगप्पों के स्वाद के लिए तरस उठा एकदम.....और फिर एकदम से आपने गोलगप्पों का जिक्र ही बंद कर दिया...:/

    प्रेमचंद जी की ''बूढी काकी'' कहानी का वो दृश्य एकदम ज़ेहन में कौंध गया....जहाँ काकी घर में होने वाली दावत के पकवानों के बारे में सोच रहीं हैं...उनका कितना सजीव वर्णन किया है प्रेमचंद जी ने.......
    यहाँ कहना चाहूंगी कि आपने पानीपुरी के चहेतों के साथ बड़ी नाइंसाफी की...:(:(

    खैर.....
    पानीपुरी के स्वाद से बाहर आकर इस लेख के मर्म पर चलते हैं...
    बहुत सही विषय है.....इसका एकमात्र उपाय तो शिक्षा ही है...व्यवहारिक ज्ञान...अव्वल तो बच्चे ऐसे कामों में नहीं होने चाहिए अगर अब हैं तो दुकान के मालिक का फ़र्ज़ है..उन्हें सही तरह से बताने का.....इस बात कि महत्ता तो वो ही जानता है जिसे एकाध बार बढियां सा पीलिया हुआ हो..:)

    ant में......
    एक बात ईमानदारी से कहूँगी..आपके जीजाजी की तरह मैं भी वही सोचती हूँ...और लोगों को कहती भी यही हूँ.....:(

    मेरी एक जागरूक सी मौसी हैं delhi में...वहां से जबलपुर आते वक़्त उन्होंने एक .......हम्म..चलिए अच्छा छोड़िये ये किस्सा फिर कभी.........:)

    एक बात और...ये विषय थोड़े हलके फुल्के ढंग से आपने समाप्त कर दिया...कभी समय हो प्रतिभा जी..तो विस्तार दीजियेगा ....एक संजीदा आलेख के तौर पर...:)

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